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शरीअत
   

शरीअत

सारे नबी (पैग़म्बर) इस्लाम धर्म ही की शिक्षा देते चले आए हैं और इस्लाम धर्म यह है कि आप ईश्वर की सत्ता और उसके गुण और आख़िरत के (दिन मिलनेवाले) पुरस्कार या दंड पर उसी प्रकार ईमान लाएँ जिस प्रकार ईश्वर के सच्चे पैग़म्बरों ने शिक्षा दी है। ईश्वर के ग्रंथों को मानिए और सारे मनमाने तरीक़े छोड़कर उसी तरीके़ को सत्य समझिए जिसकी ओर उनमें मार्ग-दर्शन किया गया है। ईश्वर के पैग़म्बरों के आदेशों का पालन कीजिए और सबको छोड़कर उन्हीं का अनुसरण कीजिए। अल्लाह की ‘इबादत’ में किसी को शरीक न कीजिए। इसी ईमान और इबादत का नाम दीन है और यह चीज़ सभी नबियों (पैग़म्बरों) की शिक्षाओं में समान है।
इसके बाद एक चीज़ दूसरी भी है जिसको ‘शरीअत’ कहते हैं अर्थात् ‘इबादत’ के तरीक़े, सामाजिक सिद्धांत, आपस के मामलों और सम्बन्धों के क़ानून, हराम और हलाल (वर्जित व अवर्जित), वैध-अवैध की सीमाएँ इत्यादि। इन चीज़ों के बारे में ईश्वर ने आरंभ में विभिन्न युगों और विभिन्न जातियों की अवस्था के अनुसार अपने पैग़म्बरों के पास विभिन्न शरीअतें भेजी थीं, ताकि वे प्रत्येक जाति को अलग-अलग शिष्टता और सभ्यता और नैतिकता की शिक्षा-दीक्षा देकर एक बड़े क़ानून के पालन करने के लिए तैयार करते रहें। जब यह काम पूरा हो गया, तो ईश्वर ने हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) को वह बड़ा क़ानून देकर भेजा जिसकी समस्त धाराएँ सम्पूर्ण संसार के लिए हैं। अब दीन (धर्म) तो वही है जो पिछले नबियों (पैग़म्बरों) ने सिखाया था, परन्तु पुरानी शरीअतें मंसूख़ (निरस्त) कर दी गई हैं और उनकी जगह ऐसी शरीअत क़ायम की गई है जिसमें समस्त मनुष्यों के लिए इबादत के तरीक़े और सामाजिक सिद्धांत और आपस के मामलों के क़ानून और हलाल और हराम (अवर्जित और वर्जित) की सीमाएँ समान हैं।
‘शरीअत’ के आदेश मालूम करने के साधन
हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) की ‘शरीअत’ के सिद्धांत और आदेश मालूम करने के लिए हमारे पास दो साधन हैं। एक: ‘कु़रआन’ और दूसरा: ‘हदीस’। कु़रआन अल्लाह का ‘कलाम’ (ईश्वरीय वाणी) है और उसका प्रत्येक शब्द ईश्वर की ओर से है। रही हदीस, तो इसका मतलब है, वे बातें जो ईश्वर के रसूल (सल्ल॰) से हम तक पहुँची हैं। ईश्वर के रसूल (सल्ल॰) का समस्त जीवन कु़रआन की व्याख्या था । नबी (पैग़म्बर) होने से लेकर 23 वर्ष की अवधि तक आप हर समय शिक्षा और मार्गदर्शन करने में लगे रहे और अपनी वाणी और अपने व्यवहार से लोगों को बताते रहे कि अल्लाह की इच्छा के अनुसार जीवन व्यतीत करने का तरीक़ा क्या है? इस महत्वपूर्ण जीवन में सहाबी (हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) के साथी) पुरुष और स्त्रियाँ और स्वयं हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) के नातेदार और और आपकी पत्नियाँ सब-के-सब आपकी हर बात को ध्यान से सुनते थे हर काम पर निगाह रखते थे और हर मामले में, जो उन्हें पेश आता था, आप से शरीअत का आदेश मालूम करते थे। कभी आप कहते अमुक कार्य करो और अमुक कार्य न करो, जो लोग मौजूद होते वे इस आदेश को याद कर लेते थे और उन लोगों को सुना देते थे जो इस अवसर पर मौजूद न होते थे। इसी प्रकार कभी आप कोई काम किसी विशेष ढंग से किया करते थे, देखनेवाले उसको भी याद रखते थे और न देखनेवालों से बयान कर देते थे कि आपने अमुक कार्य अमुक तरीक़े से किया था। इसी प्रकार कभी कोई व्यक्ति आपके सामने कोई काम करता तो आप या तो उसपर चुप रहते, या प्रसन्नता प्रकट करते या रोक देते थे। इन सब बातों को भी लोग सुरक्षित रखते थे। ऐसी जितनी बातें ‘सहाबी’ पुरुषों और स्त्रियों से लोगों ने सुनीं; उनको कुछ लोगों ने याद कर लिया और कुछ लोगों ने लिख लिया और यह भी याद कर लिया कि यह सूचना हमें किसके द्वारा पहुँची है। फिर इन सब उल्लेखों को धीरे-धीरे ग्रंथों में एकत्र कर लिया गया। इस प्रकार हदीस का एक बड़ा कोश जमा हो गया, जिसमें विशेष रूप से इमाम बुख़ारी, इमाम मुस्लिम, इमाम तिरमिज़ी, इमाम अबू दाऊद, इमाम नसई और इमाम इब्ने माजा (इन सबपर ईश्वर की दया हो) के ग्रंथ अधिक प्रामाणिक समझे जाते हैं।
 

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