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उत्तम समाज का निर्माण
   

उत्तम समाज के निर्माण के लिए
इस्लामएकमात्र रास्ता

उत्तम समाज का निर्माण...कैसे?
समाज-निर्माण के बहुत से क्षेत्र हैं। वे अलग-थलग नहीं बल्कि एक-दूसरे से संलग्न और संबंधित हैं। उनमें आध्यात्मिक क्षेत्र, नैतिक क्षेत्र, सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र के महत्व के अनुकूल इस आलेख में उस रास्ते की तलाश की जा रही है जो इन्सानों को उत्तम समाज के निर्माण की मंज़िल पर ले जाता है।

आध्यात्मिक क्षेत्र
 
आध्यात्मिकता इन्सान की प्रकृति में रची-बसी है। भौतिकवादी जीवन-प्रणाली के सारे भोग-विलास, ऐश व आराम सिर्फ़ शरीर को सुख देते हैं, आत्मा प्यासी रह जाती है। मानव-प्रकृति यह प्यास बुझाने के लिए व्याकुल रहती है। रहस्यवाद, सूफ़ीवाद, सन्यास, वैराग्य, संसार-त्याग (रहबानियत) और ब्रह्मचर्य आदि इसी प्यास के बुझाने के रास्ते समझे जाते हैं। लेकिन वह आत्मिक सुकून ही क्या जो दाम्पत्य, पारिवारिक व सामाजिक ज़िम्मेदारियों से भाग कर हासिल किया जाए! वह आध्यात्मिक शांति क्या जो उस सांसारिक जीवन-संघर्ष से फ़रार अख़्तियार करके प्राप्त की जाए जिसकी चुनौतियां और कठिनाइयां मनुष्य की मनुष्यता को निखारती, विकसित करती और समाज के लिए उपयोगी व लाभकारी बनाती हैं।
इसके साथ, यह समस्या तो बनी ही रहती है कि कितने लोग अपने सामाजिक उत्तरदायित्व से भाग कर मठों, ख़ानक़ाहों, आश्रमों, गुफ़ाओं और पर्वतों पर ज़िन्दगी गुज़ार सकते हैं? शायद औसतन एक लाख में एक। फिर बाक़ी मानवजाति के लिए आध्यात्मिक प्यास बुझाने का क्या रास्ता है? बल्कि, रास्ता है भी या नहीं? आइए देखें वह इस्लाम क्या कहता है जिसका आह्वान है कि वह ज़िन्दगी के हर क्षेत्र, हर मामले में मार्गदर्शन भी करता है और उत्तम व श्रेष्ठ व्यावहारिक विकल्प भी पेश करता है।
इस्लाम का रास्ता
इस्लाम के अनुसार आध्यात्मिकता की जड़ ईश-प्रेम की ज़मीन में है। इसी ज़मीन से आध्यात्मिकता का पौधा उगता और ऐसा घना, सायादार व फलदार वृक्ष बनता है जिससे व्यक्ति भी लाभान्वित होता है, परिवार भी, समाज भी और सामूहिक व्यवस्था भी। लेकिन वह प्रेम दिशाहीन, बे-लगाम, स्वच्छंद, नियम-विहीन और ‘मन की मौज’ नहीं होता। वह इन्सान को ऐसा स्वार्थी नहीं बनने देता कि अपनी आध्यात्मिक प्यास बुझाने के लिए पत्नी, संतान, माता-पिता, नातों-रिश्तों, समाज...सबसे कट जाए, सबको छोड़ दे। इस ईश-प्रेम का आरंभ-बिन्दु ‘ईश्वर की सही पहचान’ है जो इन्सान को (उसके स्वतंत्रता चिंतन-मनन, दिशाहीन ध्यान-ज्ञान, स्वच्छंद मस्तिष्क-व्यायाम और अटकल हृदय-मंथन के बजाय) ईशदूत, ईशसंदेष्टा (रसूल, नबी) के माध्यम से प्राप्त होती है। ईशदूत ही इन्सान और ईश्वर के बीच यथोचित संबंध की वास्तविकता भी बताता है और इसकी दिशा व सीमा का बोध भी कराता है। इस ईश्वरीय प्रावधान के अंतर्गत रहकर इन्सान आध्यात्मिकता की अस्पष्ट, उलटी-सीधी धुंधली राहों पर भटकने, भटकते रहने से बच जाता है, दिशाहीनता का शिकार नहीं बनता।
ऐसे सार्थक ईश-प्रेम और ईश्वर-संबंध को स्थापित करने और दृढ़ बनाने का श्रेष्ठ, सवोत्तम, प्रभावी, और अचूक उपाय इस्लाम ने ईशोपासना-प्रणाली में रखा है। ईश्वर से सीधे व घनिष्ठ संबंध का रूहानी और जिस्मानी प्रावधान, जो आध्यात्मिक विकास को सहज, सरल और अवश्यंभावी बना देता है। जब इन्सान नमाज़ के लिए हाथ बांध कर ईश्वर के समक्ष एकचित्त होकर खड़ा होता है, उसके आगे झुकता है और ज़मीन पर माथा टेक कर अपने पूरे अस्तित्व व व्यक्तित्व को उसके समक्ष डाल देता, समर्पित कर देता है तो उसे उस अवस्था में आध्यात्मिकता की चरम सीमा की अनुभूति होती है। इसी तरह रोज़ा, ज़कात (अनिवार्य धन-दान), हज और सदक़ा-ख़ैरात (स्वैच्छिक धन-दान) का भी मामला है। ईश्वर से सीधा संबंध और उसके प्रति दासता-भाव से आलंगित इन उपासनाओं के साथ सामाजिकता और सामाजिक नैतिकता का आयाम अविभाज्य रूप से जुड़ा हुआ है।
इस्लाम की शिक्षा है कि मौत को याद किया करो, इसे बहुत याद रखो; और इसके लिए मृत लोगों के जनाज़े में ज़रूर शरीक हो, क़ब्रिस्तान तक जाओ और उन्हें मिट्टी के नीचे दफ़न होना देखो। वैसे भी, क़ब्रिस्तान जाया करो। और देखो, सोचो कि इस भौतिक जीवन के अस्थायित्व, और पार्थिव शरीर (जिसके लिए सुख-सुविधा जुटाने में पूरा जीवन बीत गया) का अंजाम क्या हुआ! जब इहलौकिक जीवन की यह हैसियत और हक़ीक़त तुम अपनी आंखों से देखते रहोगे तो स्थायी पारलौकिक जीवन की सफलता के लिए बदी, बुराई, पापकर्म, अन्याय, व्यभिचार, भ्रष्टाचार और चरित्रहीनता आदि से बचना और एक ईशोन्मुख (God-oriented) सत्यनिष्ठ, पवित्र जीवन बिताना तुम्हारे लिए आसान हो जाएगा। उत्तम समाज की संरचना के यही दो मुख आयाम हैं...आध्यात्मिक आयाम...कि इंसान आंतरिक व आत्मिक शुद्धता, स्वच्छता व पवित्रता से अत्यधिक आलंगित हो जाए और पाप, बदी, छलकपट, ईर्ष्या-द्वेष, झूठ-फ़रेब, अन्याय-अत्याचार और चरित्रहीनता आदि की मैलकुचैल इन्सान के मन-मस्तिष्क से धुलती रहे।
इस्लाम ने आध्यात्मिक उत्थान के लिए पवित्र ग्रंथ कु़रआन के पाठ (तिलावत) और उस में ग़ौर-फ़िक्र करने तथा उससे सत्कर्म, सत्यनिष्ठा और नेकियों पर चलने, बुराइयों से बचने, तथा दूसरों को भी नेकी के रास्ते पर चलाने और बुरे रास्ते से रोकने की प्रेरणा, हौसला और जज़्बा हासिल करने की शिक्षा दी है। इससे व्यक्ति का आध्यात्मिक स्तर ऊंचा उठता है और इस तरह के बहुत सारे व्यक्तियों के एक बड़े समूह के लिए समाज-निर्माण के आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रभावी भूमिका निभाना आसान हो जाता है। अगर तुलनात्मक दृष्टि से देखा जाए तो निष्कर्ष यह निकलता है कि आध्यात्मिकता को सामाजिकता से सकुशल जोड़ने और दोनों के सामन्जस्य व समागम को मानव-समाज के लिए हितकारी व कल्याणकारी बनाने का रास्ता इस्लाम का एकमात्र रास्ता है।
 
सामाजिक क्षेत्र
 
आज हर जगह सामाजिक ताना-बाना ढीला पड़ चुका है और हर तरह की बुराई को सामाजिक स्वीकृति मिल रही है। धर्म, जाति, जन्म-स्थान, लिंग, भाषा आदि आधारों पर समाज पूर्णतः बंटा हुआ है। उच्च वर्ग निम्न वर्ग के शोषण को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता है और हर प्रकार की ईश्वरप्रदत्त और मानव निर्मित सुख सुविधाओं को अपने लिए, या अपने वर्ग तक सीमित रखने के लिए प्रयत्नशील है। समाज में मानव-जीवन और मान-सम्मान का कोई मूल्य नहीं रह गया है। केवल अपराधी प्रवृत्ति के लोग ही नहीं बल्कि सामान्य नागरिक, पढ़े-लिखे युवक, यहां तक कि नाबालिग़ लड़के भी बड़ी आसानी से लोगों के जान-माल और मान-सम्मान से खिलवाड़ कर रहे हैं।
नारी जाति
महिलाओं पर हर प्रकार के अन्याय और अत्याचार के प्रति भी समाज में सहनशीलता का वातावरण है। विकास और समानता के नाम पर उसे उपभोग-सामग्री बना दिया गया है और उसके शरीर से एक-एक कर कपड़े उतार कर उसे आम लोगों के सामने लाया जा रहा है। आज महिला घर से बाहर तक, कहीं सुरक्षित नहीं। पत्नी के रूप में घरेलू हिंसा का शिकार है, बेटी के रूप में पिता की जायदाद से वंचित की जाती है। स्कूल-कॉलेज हो या कार्यस्थल, हर जगह यौन-शोषण का शिकार बनती है। बल्कि जन्म से पूर्व ही कन्या-भ्रूण के रूप में उसकी हत्या सभ्य समाज में हत्या नहीं समझी जाती।
परिवार
समाज की मौलिक इकाई, ‘परिवार’ बिखर रहा है। रिश्तों का महत्व मिटता जा रहा है, पारिवारिक बंधन कमज़ोर हो रहे हैं। बूढ़े माता-पिता, जिनकी सेवा कभी सौभाग्य का प्रतीक थी, अब उनका अस्तित्व असह्य होता जा रहा है। वृद्धाश्रम का कल्चर तेज़ी से पांव पसार रहा है। संवेदनहीनता की हद तो यह है कि अब ममता जैसी भावना के लिए भी जगह नहीं रही। दुधमुंहे बच्चे के पालन-पोषण का दायित्व बाज़ार को सौंपा जा रहा है। विधवाओं के लिए भी अब परिवार में जगह नहीं, वे विधवा आश्रमों में शरण लेने को विवश हैं, जिनमें से कुछ में सुव्यवस्थित देह-व्यापार की घटनाएं भी सामने आती रही हैं।
समाज-सुधार आन्दोलन और उनके परिणाम
समाज सुधार के अनेक आन्दोलन चलाए गए, लेकिन वे भ्रष्टाचार और बाज़ारवाद की भेंट चढ़ गए। दलितों की दशा सुधारने के लिए समय-समय पर क़ानून बनाए गए, लेकिन आज भी उनकी बस्तियां उजाड़ी जाती हैं और उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार किया जाता है। राजनेता उनकी विवशता को अपनी राजनैतिक शक्ति बढ़ाने की सीढ़ी बनाते हैं। महिला आन्दोलनों का भी यही हाल हुआ। विकास और स्वतंत्रता के पश्चिमी नारों के जाल में फंसकर वास्तविक समस्या की अनदेखी की गई और रोग के बजाय लक्ष्णों के उपचार का ही प्रयास किया गया। परिणामस्वरूप स्थिति बद से बदतर होती चली गई।
इस्लाम एकमात्र रास्ता
इस्लाम स्पष्ट करता है कि अल्लाह ने धरती पर मानवजीवन का आरंभ आदम और हव्वा से किया। सभी मनुष्य आदम की ही संतान हैं, इसलिए धर्म, जाति, लिंग, भाषा, क्षेत्रीयता, रंग और वंश की भिन्नता के बावजूद सब आपस में भाई-भाई हैं। मनुष्य होने की हैसियत से सब बराबर हैं, सभी को समान अधिकार प्राप्त है। जन्म या पेशे के आधार पर किसी को किसी पर वरीयता प्राप्त नहीं है, न कोई तुच्छ है, न विशिष्ट। विशिष्टता का आधार मनुष्य के नैतिक गुण हैं, ईशपरायणता है। उसकी धन-संपत्ति या पारिवारिक रसूख़ नहीं।
परिवार समाज की वह इकाई है जहां आने वाली पीढ़ी को मानवता की सेवा, कर्तव्यनिष्ठा, समर्पण और बलिदान का प्रशिक्षण मिलता है, इसलिए इस्लाम पारिवारिक मामलों के प्रति बहुत गंभीर है और उन्हें स्वस्थ और सुदृढ़ बनाने के लिए प्रयत्नशील है। परिवार में महिला-पुरुष के समान दर्जे को स्वीकार करते हुए इस्लाम दोनों का कार्यक्षेत्र विभाजित करता है। पुरुष को घर का संरक्षक बनाता है उस पर बाहर के कामों और घर का ख़र्च उठाने की ज़िम्मेदारी डालता है। महिला पर घर चलाने और संवारने का दायित्व है। इस्लाम बच्चों से अपेक्षा करता है कि वे मां-बाप की आज्ञा का पालन करें, बल्कि मां-बाप की सेवा को इबादत का दर्जा देते हुए इसे जन्नत में प्रवेश का साधन बताता है।
परिवार की सीमा से आगे इस्लाम संबंधियों और पड़ोसियों के अधिकार को भी बहुत महत्व देता, और स्पष्ट आदेश देता है कि तुम्हारे माल में तुम्हारे संबंधियों और पड़ोसियों का भी हक़ है। सामाजिक संरचना को बनाए रखने के लिए इस्लाम समाज के समृद्ध लोगों पर यह दायित्व डालता है कि वे समाज के ग़रीबों और कमज़ोरों का ध्यान रखें।
इस्लाम ने स्त्री-पुरुष के बेरोक-टोक और अनियंत्रित मेल-जोल को रोकने के लिए ‘महरम’ और ‘नामहरम’ की सीमाएं निर्धारित कर दी हैं और पर्दे का सुव्यवस्थित प्रावधान रखा है। महिला/पुरुष के संबंध का केवल एक ही रास्ता विधिवत विवाह है, जिसमें सामाजिक दायित्व को पूरी तरह स्वीकार किया जाता है। इसके अतिरिक्त केवल कामेच्छा की पूर्ति के लिए बनाए गए सभी संबंध निषिद्ध हैं और इसके लिए कठोर सज़ा का प्रावधान है।
निकाह को अल्लाह के रसूल (सल्ल॰) की सुन्नत बताकर इस्लाम ने संन्यास और संसार-त्याग के सारे रास्ते बन्द कर दिए हैं। इस्लाम प्रकृति से बग़ावत के बजाय लोगों को सामाजिक ज़िम्मेदारियां उठाने के लिए तैयार करता है। वह ग़ैर-ज़रूरी और ख़र्चीले रीति-रिवाजों का विरोध करते हुए निकाह को सरल बनाने की शिक्षा देता है, ताकि ब्याह करना आसान हो, और समाज में व्यभिचार आदि बुराइयां पनपने नहीं पाएं।
गंभीरता और निष्ठा के साथ ग़ौर करने से यह विश्वास करने के सिवाय कोई और विकल्प नहीं रह जाता कि समाज को क्षति, आघात व टूट-फूट से बचाने और मज़बूत बुनियादों पर समाज का निर्माण करने के लिए इस्लाम ही एकमात्र विकल्प है।
 
नैतिक क्षेत्र
 
नैतिक मूल्यों के ह्रास ने आज समाज को मानवता के स्तर से बहुत नीचे गिरा दिया है। भ्रष्टाचार, घपले-घोटाले, रिश्वत और क़ानूनहीनता मानव-जीवन के प्रत्येक विभाग में रच-बस गयी है। झूठ, धोखाधड़ी, मिलावट, कालाबाज़ारी आदि बुराइयों ने समाज में जो बिगाड़ पैदा किया है, मानवता उसके नीचे कराह रही है। ‘लिव इन रिलेशन’ और समलैंगिकता जैसे मानवता-विरोधी और अप्राकृतिक कृत्य क़ानूनी मान्यता प्राप्त कर रहे हैं। स्वेच्छिक व्यभिचार को अपराध की सूची से निकाल दिया गया है जिसके फलस्वरूप ख़ून के रिश्ते भी कलंकित हो रहे हैं। अपहरण और सामूहिक बलात्कार की घटनाएं सामान्य हो गई हैं। वैध-अवैध तरीके़ से राजस्व उगाही की सरकारी नीति ने शराब को घर-घर पहुंचा दिया है जिसके कारण नैतिकता और सदाचरण समाप्त हो रहे हैं और आपराधिक प्रवृत्ति फल-फूल रही है। चोरी, लूट, हत्या जैसे अपराधों ने एक जंगल राज की स्थिति पैदा कर दी है।
क़ानून व न्याय
क़ानून और न्याय-व्यवस्था की चूलें हिल गई हैं। क़ानूनों और उन्हें लागू करने वालों की बहुतायत के साथ-साथ, उनसे अधिक अनुपात में अपराध बढ़ते जा रहे हैं। न्यायालयों में भ्रष्टाचार ने घुसपैठ कर लिया और उनकी प्रतिष्ठा व न्यायपूर्ण कार्यशीलता को कुप्रभावित कर दिया है। न्याय हासिल करना आम आदमी के लिए बहुत ही जटिल, मुश्किल, महंगा काम हो गया है।
धर्म-विमुखता
धर्म से जुड़ी नैतिक शिक्षाओं में इसका समाधान मिल सकता था, लेकिन अधिकतर धर्म आध्यात्मिकता और सामूहिक आचार-विचार को एक-दूसरे से अलग रखते हैं, बल्कि कुछ तो संसार-त्याग को ही आध्यात्मिक सफलता का मार्ग समझते हैं।
इस्लाम-एकमात्र रास्ता
इस्लाम के मूलग्रंथ कु़रआन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अल्लाह ने सत्य धर्म को इसलिए उतारा है कि उसकी शिक्षाओं का पालन करके एक ओर तो पालनहार की उपासना की जाए और दूसरी ओर मनुष्य के व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन का सुधार हो। कु़रआन में कई स्थानों पर तो मनुष्यों के बीच सत्य और न्याय की स्थापना और शिष्टाचार को इस धर्म की स्थापना का उद्देश्य बताया गया है और पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) को सद्भाव, सहयोग, दया, पवित्रता, परोपकार, शुभेच्छा आदि मानव मूल्यों की शिक्षा दी गई है (कु़रआन, 74:3-6, 93:9-10, 107:2-7)।
दूसरे स्थानों (कु़रआन, 16-90, 57-25) पर न्याय की स्थापना को सत्य धर्म का उद्देश्य बताया गया है। ईशपरायणता को सीधे न्याय से जोड़ते हुए कु़रआन कहता है, ‘‘किसी गिरोह की शत्रुता तुम्हें इतना उद्वेलित न कर दे कि तुम न्याय से फिर जाओ।’’       (कु़रआन, 5-8)
इस्लाम सामूदायिक सद्व्यवहार और ईशभय को जीवन का आधार ठहराता है। इस्लाम ने मनुष्य का नैतिक प्रशिक्षण इस प्रकार किया है कि उसके लिए स्वर्ग की चाहत और नरक से बचाव की अभिलाषा संसार प्रेम से अधिक प्रबल व शक्तिशाली प्रेरक बन जाती है। अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करना अगर किसी मनुष्य के जीवन का लक्ष्य बन जाए तो वह अवश्य ही भलाइयां करेगा, भलाइयां फैलाएगा और बुराइयों से बचेगा, बुराइयों को फैलने से रोकेगा। व्यक्तिगत और सामूहिक सदाचार उसकी प्रकृति बन जाएगी और समाज का बिगाड़ स्वाभाविक रूप से समाप्त हो जाएगा। समाज में व्याप्त अनैतिकता, चरित्रहीनता, अन्याय, अपराध व शोषण का कोई उपाय सफल न हो रहा हो (बल्कि स्थिति बिगड़ती ही जा रही हो) और आम लोग, कोई विकल्प न पाकर हताश, मायूस हो चुके हों तो यह स्थिति बड़ी चिन्ताजनक...बल्कि घातक...है। ऐसे में अगर खुले दिमाग़ व विशालहृदयता के साथ और पूर्वाग्रह से मुक्त रहकर विचार किया जाए तो मालूम होगा कि सिर्फ़ एक विकल्प है और वह है इस्लाम।
 
आर्थिक क्षेत्र
 
आर्थिक स्तर पर आज चारों ओर लूट-खसोट मची हुई है, हमारे देश में इन्सानों की बड़ी तादाद ग़रीबी के गर्त में गिरती जा रही है। ब्याज पर आधारित पूंजीवाद ने सभी नैतिक मूल्यों को रौंदते हुए अवसरवाद और शोषण के कल्चर को बढ़ावा दिया है। उपभोक्तावाद और ब्याज के माध्यम से धन बढ़ाते जाने की होड़ ग़रीब मनुष्य के कमज़ोर शरीर से ख़ून की आख़िरी बूंद तक निचोड़ लेना चाहती है। वंचितों की संख्या में दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि हो रही है। प्रत्येक अमीर ग़रीबों के साथ यही कर रहा है। धन का बहाव ग़रीबों से अमीरों की ओर हो रहा है।
पाप-जननी को सहयोग: सरकारें वित्तीय फ़ायदे और रेविन्यू से तिजोरियां भरने के लिए शराब की खपत और बिक्री को तेज़ी से बढ़ा रही और परिवारों की तबाही तथा समाज का नैतिक ताना-बानाबिखेरने और शराब-संबंधित अपराधों को बढ़ाने में सहयोग कर रही हैं।
उपभोक्तावाद का जुनून: उद्योगपतियों, पूंजीपतियों, कारपोरेट हाउसों के, करोड़पति से अरबपति और अरबपति से खरबपति बनने के लिए सरकारी और मीडियाई प्रकरणों ने जनसाधारण में अनावश्यक ख़रीदारी का जुनून पैदा कर दिया है। इस जुनून में ब्याजाधारित वित्तीय संस्थानों, बैंकों और मनीलेंडर्स की चांदी हो रही है। लोग क़र्ज़ों में डूबते जा रहे और सूद अदा करते-करते निढाल हो रहे हैं। आम आदमी अपनी क्रय-शक्ति से कहीं अधिक माल ख़र्च करके अपना और परिवार का सुकून छिन्न-भिन्न करता जा रहा है।
ब्याजाधारित अर्थव्यवस्था का क्रूर शिकंजा: वह किसान जो लोगों का पेट भरने के लिए मेहनत-मशक़्क़त करता है, ब्याजाधारित ऋण की क्रूरता से छुटकारा पाने के लिए आत्महत्या पर विवश है। ऐसे प्रताड़ित किसानों की संख्या जिन्होंने ख़ुदकुशी कर ली, लाखों लाख तक पहुंच गई है। इसी ब्याजीय अर्थव्यवस्था ने देश के 80 प्रतिशत धन-संसाधन 10 प्रतिशत लोगों के चंगुल से देकर बाक़ी 90 प्रतिशत आबादी की झोली में सिर्फ़ 10 प्रतिशत मुद्रा रहने दी है। आर्थिक-वर्ग-संघर्ष तेज़ से तेज़तर और भयावह होता जा रहा है।
‘आम आदमी’ के लुभावने नारों के बीच आम आदमी को अपनी आर्थिक दुर्दशा से मुक्ति का कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा। वह हताश और मायूस है। कोई विकल्प न होने के कारण डकैती, चोरी, लूट, ग़बन, रिश्वत और ‘फिरौती के लिए अपहरण’ का चलन तेज़ी से बढ़ रहा है। लेकिन ऐसा हरगिज़ नहीं है कि कृपाशील दयावान ईश्वर ने अपने बन्दों को ऐसी लाचारी व बेबसी में डाल दिया हो। उस प्रभु ने सन्मार्ग-दर्शन अवश्य किया है। इन्सानों को बेबस व बेसहारा न वह छोड़ सकता था, न ही छोड़ रखा है। वह रास्ता कौन-सा है? निश्चित रूप से वह इस्लाम का रास्ता है।
इस्लाम पूरी मानवता का हितैषी है। इसने धन-दौलत कमाने और इसके लिए परिश्रम व भाग-दौड़ को व्यक्ति और समाज दोनों के लिए भलाई का माध्यम बनाया है। कु़रआन (102:1-2) में धन को इस तरह से जमा करने की प्रवृत्ति की कठोर शब्दों में निंदा की गई है कि माल-दौलत कुछ मुट्ठियों में बंद, कुछ तिजोरियों में इकट्ठी और धनाढ्यों, साहूकारों, पूंजीपतियों के पास सिमट कर रह जाए, और परिणामतः लाखों-करोड़ों आम लोग अपनी आजीविका के साधनों से भी वंचित रह जाएं। स्वयं पर दूसरों को वरीयता देने की शिक्षा दी गई है (कु़रआन, 59:9)। और कहा गया है कि तुम्हारे माल में वंचितों और मांगने वालों का भी अधिकार है (कु़रआन, 51:19)। ब्याज को पूर्णतः निषिद्ध ठहराते हुए कु़रआन कहता है कि जो लोग ब्याज खाते हैं उनका हाल उस व्यक्ति जैसा है, जिसे शैतान ने छूकर बावला कर दिया हो (कु़रआन, 2:275)। व्यापार को पवित्र बनाने के लिए धोखा, और माप-तौल में कमी करने को धरती में बिगाड़ फैलाने जैसा बताया है। माल को जमा करके रखने वालों को चेतावनी देते हुए उन्हें (पारलौकिक जीवन में) कष्टदायक यातना की सूचना दी गई है। (कु़रआन, 104:2-4)
इस्लाम जीवन की सुख-सुविधाओं के लिए प्रयासों से मनुष्य को नहीं रोकता है (कु़रआन, 7:32)। अल्लाह के रसूल (सल्ल॰) ने हलाल कमाई के लिए भाग-दौड़ करने और अपने बीवी-बच्चों के लिए जीवन सामग्री जुटाने के प्रयासों को गरिमा प्रदान करते हुए ‘‘अल्लाह के मार्ग में किया गया प्रयास’’ बताया है। माल कमाने के साथ-साथ इस्लाम उसे ख़र्च करने के लिए भी संतुलित सीमाएं निर्धारित करता है। माल मनुष्य के पास अल्लाह का धरोहर (अमानत) है अतः उसे अल्लाह के बताए हुए तरीके़ पर ही ख़र्च किया जाएगा। न अपव्यय करके माल को बरबाद किया जाना चाहिए और न ही कंजूसी करके समाज को माल के लाभों और उसकी उपयोगिता से वंचित किया जाना चाहिए। आमदनी के स्रोत की पवित्रता को अनिवार्य ठहराया गया है और ग़लत ढंग से एक-दूसरे का माल खाने को अपनी हत्या करने जैसा बताया गया है (कु़रआन, 4:29)।
इस प्रकार इस्लाम ने अर्थव्यवस्था को स्वस्थ आधारों पर खड़ा किया है। इसने एक ऐसे समाज के निर्माण को सभी मनुष्यों का पहला लक्ष्य बताया है, जहां जीविकोपार्जन भी इबादत हो। जहां केवल पवित्र और हलाल कमाई ही की जाती हो; और पवित्र माल वह है जो हलाल तरीक़ों से कमाया जाए और उसे इस प्रकार ख़र्च किया जाए, जो मानवता के लिए कल्याणकारी और उपयोगी हो। कमाई के साथ-साथ ख़र्च करने के नियम भी निर्धारित कर दिए गए हैं।
इस्लाम की आर्थिक व्यवस्था सीधे समाजहित से जुड़ी हुई है। जक़ात (अनिवार्य धन-दान) सदक़ा-ख़ैरात (स्वैच्छिक धन-दान) द्वारा राष्ट्रीय धन-संसाधन और माल-दौलत को ऊपर से नीचे, प्रवाहित होते रहने का प्रावधान किया गया है, जिसमें धनवानों की दौलत एक स्वचालित प्रक्रिया से निरंतर निर्धनों और ज़रूरतमंदों के पास पहुंचती रहे, धन-लोलुपता का विष समाज के लिए घातक बनने से पहले ही विलीन, लुप्त हो जाए। आर्थिक-वर्ग-संघर्ष की आग में समाज जलने न पाए, ग़रीब लोग समझें कि अमीर लोगों को हमारी आवश्यकताओं की चिंता रहती है, वे हमारे शत्रु, शोषणकारी और प्रतिद्वंद्वी नहीं, हमारे शुभचिंतक, हमारे हितैषी व सहयोगी हैं। वे हमें क़र्ज़ देंगे तो ब्याज के सिरिंज से हमारे आर्थिक शरीर का ख़ून नहीं निचोड़ेंगे, बल्कि पुण्य कार्य समझ कर हमारी सहायता की भावना से क़र्ज़ देंगे।
इस्लाम ने समाज में वित्तीय संसाधनों को मात्र कुछ ही लोगों के हाथों में सीमित न रहने देने के लिए तरक़ा की ऐसी प्रणाली बनाकर लागू की जिससे एक व्यक्ति जो माल, दौलत, प्रॉपर्टी, जायदाद, बैंक बैलेंस आदि छोड़कर मरता है तो वह सब कुछ निकट संबंधियों, ख़ून के रिश्तों में अनेक लोगों (पुरुषों व स्त्रियों दोनों) के बीच थोड़ा-थोड़ा बंट जाता है। इस तरह माल समाज में फैलता है, कुछ लोगों तक सीमित नहीं रह जाता। न धनाढ्यों की संख्या बहुत बढ़ने पाती है, न निर्धनों, महरूमों, परेशानहाल लोगों की संख्या। और जब समाज की ठोस ज़मीन पर दृश्य-पट यह हो तो फिर वह कौन-सा बुद्धिमान, विवेकशील व सत्यप्रिय व्यक्ति होगा जो यह स्वीकार न करे कि आर्थिक पहलू से उत्तम समाज के निर्माण का एकमात्र रास्ता इस्लाम है!
 



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