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अब्दुल्लाह सिद्दीक़
   

अब्दुल्लाह सिद्दीक़
(भूतपूर्व ‘अनिल कुमार’)
लेक्चरर, हिन्दी विभाग,  जे॰एम॰आई॰ विश्वविद्यालय, जन्म 1962

 

‘‘मेरे नाना आर्य समाजी, दादा सनातनी और माता-पिता ‘राधास्वामी’ सम्प्रदाय के थे। ....1978 में, जबकि मेरी उम्र 16 साल थी, रेलगाड़ी में सफ़र कर रहा था, देखा एक बुज़ुर्ग अपने साथियों को (इस्लामी) धार्मिक क़िस्से सुना रहे थे। मैंने उनसे एक साथ बहुत सारे प्रश्न कर डाले। ‘आप गाय का मांस क्यों खाते हैं। नमाज़ पढ़ते हैं तो इतना चिल्लाते क्यों हैं (उस वक़्त मैं अज़ान और नमाज़ में फ़र्व़$ नहीं जानता था)। आप (धार्मिक त्योहारों और रोज़ा आदि के लिए) चांद को क्यों देखते हैं, क्या आपका ख़ुदा चांद पर (रहता) है?....आदि। उन्होंने मुझे अपने घर आने का न्योता दिया। ....वु$छ दिनों बाद मैं डरते-डरते उनके घर गया। मुझे क़ुरआन का अनुवाद सुनाया गया और उसकी व्याख्या भी की गई....।’’
‘‘1976 में बहन की शादी हुई तो देखा कि इसमें संसाधनों की ख़ूब बरबादी हो रही है। यह मुझे दिल से नापसन्द था। हम चूंकि आर्य समाजी थे इसलिए मूर्ति-पूजा नहीं करते थे बल्कि यज्ञ करते थे जिसमें इस तरह (के संसाधनों) की बरबादी होती थी। मैं चूंकि इन सब चीज़ों से बेज़ार था और किसी अच्छे रास्ते की खोज में था, अल्लाह ने मुझे इस्लाम का रास्ता सुझा दिया। ....अल्लाह की कृपा से मस्तिष्क से अंधकार के सारे बादल छँट गए और अक्टूबर 1978 में मैं इस्लाम के दायरे में दाख़िल हो गया।’’


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