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मुहम्मद उमर गौतम
   

मुहम्मद उमर गौतम
(वरिष्ठ विद्वान, समाज-सेवक,
जन्म 1964, ज़िला फ़तहपुर, उ॰प्र॰)

 

‘‘...पन्द्रह साल की उम्र में मेरे मन-मस्तिष्क में यह प्रश्न उठा कि हमारे घर और ख़ानदान में जो पूजा-पाठ का तरीक़ा चल रहा है और मूर्ति-पूजा हो रही है वह कहाँ तक उचित है। हमें पन्द्रह साल की उम्र तक यह नहीं बताया गया था कि हम हिन्दू हैं तो क्यों हैं और हमारी आस्था व विश्वास (ईमान और यक़ीन) क्या है......हमारा स्रष्टा, स्वामी, पालनहार कौन है? हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है? मरने के बाद कहाँ पहुँचेंगे? किस की पूजा की जाए, किसकी न की जाए? 33 करोड़ देवी-देवताओं की पूजा कैसे की जाए? 86 लाख योनियों में आवागमन कैसे संभव है?.... समाज में अपने ही जैसे मनुष्यों को अछूत बना दिया गया है....आदि, आदि।
1984 में पढ़ाई के लिए हॉस्टल में रहने के दौरान स्कूटर से मेरे साथ एक दुर्घटना हुई। मेरे एक सहपाठी व सहवासी मित्र ने मेरी बहुत सेवा की। ....मैंने उनसे पूछा कि आप मेरे लिए इतना कुछ क्यों कर रहे हैं, तो उन्होंने कहा कि ‘मेरा धर्म इस्लाम है और इस्लाम की शिक्षा है कि पड़ोसी के साथ—चाहे वह कोई भी (अर्थात् किसी भी धर्म का अनुयायी) हो अच्छा सलूक करना, उसकी मुसीबत में काम आना एक मुसलमान की बुनियादी ज़िम्मेदारी है, अगर मैंने आपकी मदद नहीं की, और आपके काम न आया तो मुझे डर है कि परलोक में मैं अल्लाह को क्या मुँह दिखाऊँगा।’
‘‘....उनके ज़रिए लगभग छः महीने तक मैं इस्लामी पुस्तकों का अध्ययन करता रहा और विभिन्न विषयों पर चालीस पचास किताबें पढ़ डालीं और इस्लाम की पूरी तस्वीर मेरे सामने आ गई। ....मुझे बता दिया गया था कि क़ुरआन एक ईश-अवतरित ग्रंथ और सारे इन्सानों के लिए मार्गदर्शन है। अतः मैंने पूरी निष्ठा के साथ क़ुरआन का अनुवाद पढ़ा तो (पिछले) तमाम प्रश्नों के उत्तर स्वतः मिलते चले गए। और अल्लाह ने अपना वादा सच कर दिया कि जो लोग सत्यमार्ग पाने की आकांक्षा रखते हों उन्हें सन्मार्ग अवश्य मिलेगा....।’’

 


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