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एकेश्वरवाद की मौलिक धारणा
   

आज संसार में इस्लाम ही एकमात्र ऐसा धर्म है, जो एकेश्वरवाद की मौलिक धारणा को पेश करता है और उसके विरुद्ध अनेकेश्वरवाद और शिर्क से होने वाले नुक़सान को स्पष्ट रूप से बतलाता है। ईश्वर को एक मानकर उसकी ज़ात, गुण, अधिकार और इख़्तियार में किसी को साझी ठहराना शिर्क है। यह शिर्क ईश्वर के इन्कार से बढ़कर इन्सान के लिए हानिकारक है। क़ुरआन एकेश्वरवाद की धरणा के साथ-साथ अमली ज़िन्दगी में उसके तक़ाज़ों के बारे में बताता है। क़ुरआन का कहना है कि जो इन्सान ईश्वर को एक मानता हो, उसके लिए आवश्यक है कि वह अपने जीवन में इसके तक़ाज़ों को पूरा करे। इसके बिना ईश्वर को मानना या न मानना दोनों बराबर है।
ईश्वर अल्लाह को एक मानने का अर्थ और उसके अमली तक़ाज़ों को क़ुरआन ने प्रमाणों के आधर पर समझाया है।

  1. वह ईश्वर इन्सान, सृष्टि और इस ब्रह्माण्ड को पैदा करनेवाला ही नहीं, बल्कि मालिक, रब और पालनहार और शासक भी है।
  2. ईश्वर का कोई परिवार, बेटा, पत्नी नहीं है। वह सदैव से है और सदैव रहेगा।
  3. उसके अच्छे गुणों में जैसे वह राज़िक़ (रोज़ी देनेवाला), आदिल (न्याय करनेवाला), अलीम (हर चीज़ का ज्ञान रखनेवाला) है, वह समी (सुननेवाला) और बसीर (देखनेवाला) है। यह सारे गुण उसके अस्तित्व के अलग-अलग रूप नहीं हैं, कि उनकी पूजा व इबादत की जाए, बल्कि ये सब उसी एक ही ईश्वर के गुण हैं।
  4. वह अपनी सृष्टि, विशेष रूप से इन्सानों को मार्गदर्शन और क़ानून देनेवाला भी है। उसने हर एक के लिए कुछ सिद्धांत व नियम बनाए। इन्सान ईश्वर की अनुपम सृष्टि है, इसलिए उनकी हिदायत व रहनुमाई के लिए एक बेहतरीन सिस्टम बनाया, जिसे ईशदूतत्व कहते हैं। इस धरती पर पहले इन्सान आदम (अलैहि॰) अल्लाह के संदेशवाहक थे। आख़िरी संदेष्टा हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) हैं। संसार के अलग-अलग देशों, ज़मानों एवं विभिन्न भाषाओं में 1,24,000 संदेशवाहक आए हैं। ये संदेशवाहक ईश्वर की ओर से मार्गदर्शन, हिदायत और रहनुमाई लेकर आते और उसके अनुसार अपना जीवन व्यतीत करते। इसी तरह ईश्वर को मानने का अर्थ यह हुआ कि उसके सारे संदेष्टाओं और अंतिम संदेष्टा हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) को माना जाए।
  5. ईश्वर को एक मानने का अर्थ यह भी है कि उसे निराकार व अजन्मा माना जाए। उसे किसी ने अपनी आंखों से देखा नहीं और न ही इस दुनिया में कोई उसे देख सकता है। दुनिया में उसका जो चित्र व रूप बनाया जाता है, वह सच्चाई व यथार्थ से परे है।
  6. ईश्वर को एक मानने का एक अर्थ यह भी है कि उसके आदेशों व निर्देशों को जो अन्तिम ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) के द्वारा मानव के लिए भेजे गए उन्हें माना जाए और उनका पालन किया जाए। यह आदेश-निर्देश और जीवन के लिए मार्गदर्शन अब क़ुरआन और मुहम्मद (सल्ल॰) के जीवन में सुरक्षित है।

क़ुरआन से पहले के ग्रंथों, वेद व बाइबल इत्यादि में उस काल व समय के इन्सानों के लिए ईश्वर के आदेश आए थे। उन ग्रंथों का आदर करना होगा, परन्तु अब क़ुरआन ही मार्गदर्शन करेगा। अगर कोई वेदों व बाइबल को माने और क़ुरआन का इन्कार करे, तो वह न वेदों का माननेवाला है और न ही बाइबल का, क्योंकि वेदों व बाइबल को जिस आधार पर ईश्वरीय ग्रंथ माना जाता है, उसी आधर पर क़ुरआन को ईश्वरीय ग्रंथ मानना चाहिए, क्योंकि पिछले ग्रंथों में समय के साथ-साथ परिवर्तन होता रहा, इसलिए अब वे सुरक्षित नहीं हैं मात्र क़ुरआन ही सुरक्षित है।
क़ुरआन में एकेश्वरवाद के सिलसिले में प्रमाणों के आधर पर इन्सानों के चिंतन-मनन, मानने या न मानने की आज़ादी की बात विस्तारपूर्वक कही गयी है। क़ुरआन में है, ऐ मुहम्मद! आप लोगों से कह दीजिए, लोगो यह तुम्हारे रब की ओर से हक़ है, यदि उसको मानो या इन्कार कर दो। (इसकी ज़िम्मेदारी व नतीजा तुम्हारे ऊपर ही होगा) (क़ुरआन, 18:29)
एकेश्वरवाद को समझने के लिए शिर्क को जानना भी ज़रूरी है। एकेश्वरवाद की ज़िद (विलोम) शिर्क है। यह सबसे बड़ा महापाप है। क़ुरआन ने तो यहां तक कहा है कि अगर कोई शिर्क का गुनाह करे फिर तौबा करके उसे न छोड़े, तो अल्लाह उसके गुनाह को माफ़ नहीं करेगा। शिर्क के साथ कोई भी नेकी पारलौकिक जीवन में कोई काम नहीं आएगी।
क़ुरआन ने शिर्क को महापाप बताया है। धरती पर मानव का आरंभ एकेश्वरवाद से हुआ है। हज़रत आदम (अलैहि॰) एवं हव्वा (अलैहि॰) सारे मानवजाति के माता-पिता थे। वे और उनकी संतान एकेश्वरवाद पर क़ायम थे। उनकी मृत्यु के बाद उनकी संतान में शिर्क आया। विशेषतः अल्लाह के एक संदेष्टा हज़रत नूह (अलैहि॰)का काल हज़रत आदम (अलैहि॰) के बाद का है। इस काल में बड़े बुज़ुर्गों की याद के लिए उनके पांच बड़े बुत (मूर्ति) बनाकर रखे गए थे। बाद के लोगों ने उनको याद रखने से आगे बढ़कर उन बुतों की पूजा करनी शुरू कर दी। इस तरह मूर्तिपूजा का आरंभ हुआ। कुछ लोग जानकारी न होने के कारण से यह समझते हैं कि काबा एक मंदिर था और मक्केश्वर भगवान और अनेक भगवानों की मूर्तियां वहां थीं। हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) ने वहां से सब मूर्तियों को निकालकर केवल एक ईश्वर की बात कही, जबकि इतिहास में ऐसी बात नहीं है। हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) के ज़माने में ख़ाना-ए-काबा में बुत ज़रूर थे, लेकिन जब यह इबादतगाह हज़रत इबराहीम (अलैहि॰) ने हज़ारों वर्ष पहले मक्का में बनायी थी, तो वह केवल एक ईश्वर की इबादत व उपासना के लिए थी। हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) से केवल 350 वर्ष पहले अम्र बिन हई एक बड़े आदमी ने मक्का से शाम (सीरिया) की यात्रा पर वापस आते समय कुछ बुत लाकर ख़ाना-ए-काबा में रख दिए। वहीं से ख़ाना-ए-काबा में मूर्तिपूजा शुरू हुई।

एकेश्वरवाद की वास्तविकता

यह एक सर्वमान्य सच्चाई है कि मनुष्य सृजनकार-ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना है। सृष्टि के अन्य सभी जीवों, वस्तुओं, चीज़ों और प्राकृतिक संरचनाओं में केवल मनुष्य को ही कुछ विशिष्ट गुण, क्षमताएं और अधिकार मिले हुए हैं, जिनके अंतर्गत वह अपनी बुद्धि और अक़्ल का प्रयोग सकारात्मक और नकारात्मक दोनों दिशाओं में करने के लिए स्वतंत्र है। वह अपने इच्छानुसार जीवन बरतता और जीता है। वास्तव में यह स्वतंत्रता और इरादे की शक्ति उसकी परीक्षा है, अन्यथा वह भी कई अन्य पहलुओं से सूर्य, चन्द्रमा आदि प्राकृतिक रचनाओं की भांति निश्चित नियम का पाबंद होता है। वह चाहता है तो ईश्वरीय आदेशों और निर्देशों के अनुसार जीवन व्यतीत करता है और इस प्रकार अपने लौकिक व पारलौकिक जीवन को सफल बनाता है। इसके विपरीत वह स्वच्छंद जीवन जीकर सर्वथा असफल परिणाम का भुक्त भोगी बनता है।
मनुष्य वह प्राणी है जिसको ईश्वर ने इतनी शक्ति व सामर्थ्य प्रदान की है कि वह एक सीमा के अंतर्गत सृष्टि के संसाधनों से लाभ उठा सकता है और उसका दोहन भी कर सकता है। इस दृष्टि से यह स्पष्ट है कि सृष्टि में जो मानव को स्थान प्रदान किया गया है, वह सोद्देश्य है और विशिष्ट उद्देश्य के अंतर्गत ही मनुष्य के लिए वे असीमित और असंख्य संसाधन जुटाए गए हैं।
स्वाभाविक रूप से एवं सुगमता के साथ यह तथ्य और मर्म समझा जा सकता है कि जिस स्रष्टा-पालनकर्ता प्रभु ने जिस मानव तथा उसके लिए विशाल सृष्टि को उत्पन्न किया है उसे उसका उपकृत होकर ही नहीं, बल्कि उसके प्रति निष्ठावान एवं आभारी होकर भी उसकी भक्ति व बन्दगी करनी चाहिए। इस प्रकार मनुष्य और उसके स्रष्टा के बीच एक विशिष्ट प्रकार का मधुर संबंध पाया जाता है। कुछ अनेकेश्वरवादी लोग इस संबंध का इन्कार और उसकी अवहेलना कर सकते हैं, लेकिन ईश्वर एवं उसकी सृष्टि के बीच मानव के इस कोमल नैसर्गिक संबंध में कदापि कोई परिवर्तन नहीं ला सकते। यह तथ्य स्वमेव सप्रमाण हर काल और समय में उपस्थित रहा है। फिर भी आश्चर्य और चिंता का विषय है कि अंधता के विश्वासियों की दृष्टि नहीं खुल पा रही है!
स्रष्टा और मनुष्य के बीच इस संबंध को अपेक्षित है कि मनुष्य अपने पालनकर्ता प्रभु का आज्ञाकारी बने और उसके आदेशों व इच्छाओं के अनुसार अपना जीवन व्यतीत करे। उस एक ईश्वर स्रष्टा, पालनकर्ता को छोड़कर किसी अन्य को पूज्य, उपास्य, नियंता, अधिपति न बनाए। वह विशुद्धभाव से एकेश्वरवादी बने और एक ईश्वर को ही अपना उपास्य और पूज्य माने। अपनी आवश्यकताओं, आकांक्षाओं और अपेक्षाओं आदि के लिए उसी की ओर रुजू करे, उसी से विनीत भाव से प्रार्थना करे और उसकी ही प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयास करे। मनुष्य के पास एक ही हृदय है, जो एक ईश्वर की भक्ति की सामर्थ्य रखता है, फिर भक्ति को विखंडित तो किया ही नहीं जा सकता। अन्तरात्मा को भी यही वांछित है कि वह एक ही ईश्वर की भक्ति करे।
मनुष्य के अपने स्रष्टा के साथ इस प्रकार के मधुर संबंध की उक्त और अन्य अपेक्षाओं-वांछाओं को मानव जीवन में सही तौर पर उतारने, बरतने और उन्हें अमल में लाने के परिणामस्वरूप जीवन में जो गुण, विशिष्टताएं, शील-स्वभाव, नैतिकता और सदाचार पैदा होते हैं वे जीवन को विकारों और चिंताओं से मुक्त करते ही हैं, ईश्वर की प्रसन्नता का इतना उत्तम साधन बन जाते हैं कि मनुष्य का लोक-परलोक दोनों सुधर-संवर जाता है। यही सफलता मानव जीवन की वास्तविक सफलता है।
इसके विपरीत जो मनुष्य स्रष्टा के नैसर्गिक संबंध को झुठलाता है, उससे मुंह फेरता है वह बड़ा कृतघ्न तो है ही अपने जीवन को अत्यंत जटिल और समस्याग्रस्त भी बना लेता है। अंततः उसके हाथ असफलता और निराशा ही लगती है। मानव इतिहास यह बताता है कि मनुष्य अपने विवेक का प्रयोग उद्दंडता, निरंकुशता और मनमाने व्यवहार के रूप में भी करता रहा है, वहीं दूसरी ओर करुणामय, पालनहार, स्रष्टा ने उसे बार-बार सन्मार्ग दिखाया और इस्लाम को परिपूर्ण रूप से ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) के द्वारा भेजा। ईश्वरीय शिक्षाओं को जब भी झुठलाया गया या उनमें परिवर्तन आ गया तो इसका समाज पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा और उसमें बिगाड़ आ गया। इन अवसरों पर सर्वशक्तिमान संप्रभु, ईश्वर मनुष्य के मार्गदर्शन के लिए अपने दूत, संदेशवाहक, पैग़म्बर और रसूल भेजता रहा एवं आवश्यकता के अनुसार उन पर अपनी किताब उतारी। इस प्रकार करुणामय दयावान प्रभु ने उन शिक्षाओं को मनुष्य तक पहुंचाने का प्रबंध किया जिन्हें वे भुला बैठे थे। ईश्वर के दूत और पैग़म्बर संसार के प्रत्येक भू-भाग में भेजे गए, अतः भारत में भी वे ईश्वर का संदेश लेकर आए होंगे। सभी नबियों ने अपने आह्वान का आरंभ एकेश्वरवाद (तौहीद) से किया और इस पर इस प्रकार जमे रहे कि किसी भी हाल में इससे बाल बराबर भी हटने को तैयार न हुए। अल्लाह के अंतिम रसूल हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) से विरोधियों ने बार-बार चाहा कि आप इस विषय में थोड़ी-सी नरमी दिखाएं, लेकिन आपने ज़रा भी नरमी नहीं दिखाई, यहां तक कि आपको प्रलोभन दिया गया, रिश्वत में वह सब कुछ पेश किया जिसकी उन्हें सामर्थ्य थी, लेकिन इन सब उपायों के बावजूद भी वे पैग़म्बर को विचलित न कर सके।

इस्लाम : विशुद्ध एकेश्वरवादी धर्म

‘इस्लाम’ का शाब्दिक अर्थ है—आज्ञा मानना अर्थात् एक ईश्वर सर्वशक्तिमान की आज्ञा का पालन करना। आज्ञापालन करनेवाले को मुस्लिम कहते हैं। इस्लाम ‘सिल्म’ धतु अक्षर से बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ अम्न और शांति है। ‘इस्लाम’ शब्द का अर्थ है ईश—आज्ञापालन द्वारा शांति की (अवश्यंभावी) प्राप्ति।
इस्लाम विशुद्ध एकेश्वरवादी धर्म है। अर्थात् उसकी यह धरणा है कि संपूर्ण जगत का एक ही ईश और ख़ुदा है और वही एक मात्र पूज्य और उपास्य है। इस्लामी शब्दावली में ईश, पूज्य प्रभु, पालनहार को अल्लाह कहा जाता है, परन्तु अल्लाह शब्द का शाब्दिक अर्थ क्या है। आगे बढ़ने से पहले इसे जान लेना उचित और समीचीन होगा। ‘‘अल्लाह’’ शब्द का अर्थ निरुपण मौलाना अबुल-कलाम आज़ाद ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘‘तफ्सीर सूरह फ़ातिहा’’ में निम्नलिखित शब्दों में किया है—
‘‘सामी भाषाओं के अध्ययन से ज्ञात होता है कि व्यंजनों और स्वरों का एक मुख्य समूह है, जो ‘‘पूजित’’ के अर्थ में प्रयुक्त होता रहा है। इबरानी, सुरयानी, कलदानी, हमीरी, अरबी आदि समस्त भाषाओं में उसका यही शाब्दिक गुण पाया जाता है। यह ‘अलिफ़’, ‘लाम’ और ‘हे’ का धातु है। कलदानी और सुरयानी का ‘अलाहिया’, इबरानी का ‘उलूह’ और अरबी का ‘इलाह’ इसी से बना है। और निस्सन्देह यही ‘इलाह’
 है, जो ‘अलिफ़’ और ‘लाम’ अक्षरों के बढ़ा देने से ‘अल्लाह’ हो गया है, और इस प्रयोग ने ‘अल्लाह’ नाम को उस सत्ता के लिए विशिष्ट कर दिया है, जो संपूर्ण सृष्टि का रचयिता है। परन्तु यदि ‘अल्लाह’, ’इलाह’ से बना है तो ‘अल्लाह’ का अर्थ क्या है? इसके संबंध में विद्वानों के विभिन्न कथन हैं। परन्तु सबसे अधिक प्रबल पक्ष यह ज्ञात होता है कि इस नाम का उद्गम शब्द ‘अलह’ है। ‘अलह’ का अर्थ चकित और विवश हो जाना है। कुछ ने कहा है कि ‘अल्लाह’, ‘वलह’ शब्द से बना है। इसका अर्थ भी यही है। अतः सृष्टि के रचयिता का नाम ‘अल्लाह’ इसलिए हुआ कि इस सत्ता के विषय में मनुष्य जो कुछ जानता है और जान सकता है वह इससे अधिक और कुछ नहीं है कि बुद्धिचकित रह जाए और उसकी वास्तविकता को समझने के लिए विवश हो जाए।’’
‘‘अल्लाह’’ शब्द का अर्थ स्पष्ट करते हुए मौलाना अबू-मुहम्मद इमामुद्दीन ‘रामनगरी’ लिखते हैं—
‘इलाह’ का अर्थ है: पूज्य। इसलिए ‘इलाह’ प्रत्येक उस व्यक्ति, जीव और निर्जीव वस्तु को कह सकते हैं जिसकी पूजा की जाए। इस ‘इलाह’ शब्द में ‘अ’ और ‘ल’ संयुक्त कर ‘अल्लाह’ कर देने का अभिप्राय यह है कि एक ईश्वर ही पूज्य है। इसके अतिरिक्त कोई और पूज्य व उपास्य नहीं है।
(इस्लाम का एकेश्वरवाद, पृ॰ 1, इस्लामी साहित्य सदन, रामनगर, वाराणसी)
‘अल्लाह’ शब्द में यह विशिष्ट गुण निहित है कि उसका प्रयोग एक ही उपास्य-प्रभु के लिए हो सकता है। भाषा विज्ञान के अनुसार, उसके सिवा किसी अन्य के लिए इसका प्रयोग नहीं हो सकता। इस शब्द का न तो कोई बहुवचन है और न ही इसका कोई लिंग (Gender) है। इस शब्द का सटीक हिन्दी अनुवाद ‘ईश्वर’ इसलिए नहीं हो सकता क्योंकि यह शब्द भगवान, देवी-देवता, देव, विशिष्ट पुरुष अथवा जीव आदि उपास्यों के लिए भी भाववाचक रूप में प्रायः प्रयुक्त होता है। यह ज़रूर है कि काम चलाने अथवा समझने-समझाने के लिए अल्लाह का अनुवाद ईश्वर किया जा सकता है। वैसे क़ुरआन के मुताबिक़ सारे अच्छे नाम अल्लाह के ही लिए है। एक हदीस के अनुसार अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) ने अल्लाह के लिए 99 नामों का उल्लेख किया है, जिसे ‘‘अस्समाउलहुस्ना’’ (अल्लाह के अच्छे नाम) कहा जाता है।
क़ुरआन में है—

  • ‘‘कह दो अल्लाह कहकर पुकारो या रहमान कहकर जिस नाम से भी पुकारो उसके सब अच्छे ही नाम हैं।’’  (17:110)
  • ‘‘अल्लाह अच्छे नामों का अधिकारी है—उसको अच्छे ही नामों से पुकारो और उन लोगों को छोड़ दो, जो उसके नाम रखने में सच्चाई से हट जाते हैं।’’ (7:180)
  • ‘‘वह अल्लाह ही है उसके सिवा कोई पूज्य नहीं, उसके लिए सर्वोत्तम नाम हैं।’’ (20:8)

अल्लाह एक है

‘‘अल्लाह’’ शब्द में उसके एक होने का अर्थ निहित है। पवित्र क़ुरआन में अल्लाह के एक होने के संबंध में अनेक आयतें अवतरित हुई हैं, जिनमें से कुछ निम्नलिखित हैं—

  • ‘‘तुम्हारा पूज्य प्रभु एक ही पूज्य प्रभु है, उस करुणामय और दयावान के सिवा कोई और पूज्य प्रभु नहीं है।’’   (2:163)
  • ‘‘वही अल्लाह है उसके सिवा कोई पूज्य प्रभु नहीं।’’  (28:70)
  • ‘‘कह दो वह अल्लाह है यकता (अकेला)।’’  (112:1)
  • ‘‘अल्लाह का आदेश है दो ख़ुदा न बनाओ, ख़ुदा तो बस एक ही है।’’  (16:51)

वास्तव में इस्लाम की शिक्षाओं का सार-तत्व एकेश्वरवाद (तौहीद) है। दूसरे शब्दों में यह इस्लाम की आधारशिला है। ‘‘ला इलाह इल्लल्लाह’’ अर्थात् अल्लाह के सिवा कोई पूज्य-प्रभु नहीं—इस्लाम के प्रथम सूत्र-वाक्य (कलिमा) का आरंभिक वाक्यांश है, जिस पर ईमान लाना प्रत्येक मुसलमान के लिए अनिवार्य है। हम अपनी खुली आंखों और बुद्धि-विवेक एवं चेतना के ज़रिए से जब समूची सृष्टि पर नज़र डालते हैं, तो एक से अधिक ईश्वर के न चिन्ह मिलते हैं न प्रमाण। स्वयं ‘ब्रह्माण्ड’ शब्द भी इस सत्य-तथ्य का द्योतक है। अन्य धर्म-ग्रंथों में भी इस सिलसिले में कई उद्धरण पाए जाते हैं, जो इस सच्चाई और वास्तविकता को प्रकट करते हैं। मानव की प्रकृति मौलिक रूप से एकेश्वरवाद के प्रति ही आकर्षित होती है, क्योंकि यह उसके सर्वथा अनुकूल है। क़ुरआन में है—

  • ‘‘अल्लाह एक मिसाल देता है। एक व्यक्ति तो वह है जिसके मालिक होने में बहुत-से दुःशील स्वामी साक्षी हैं जो उसे अपनी-अपनी ओर खींचते हैं और दूसरा व्यक्ति पूरा का पूरा एक ही स्वामी का दास है। क्या इन दोनों का हाल एक-सा हो सकता है? —प्रशंसा अल्लाह के लिए है, मगर ज़्यादातर लोग नादानी में पड़े हुए हैं।’’ (39:29)

उसका कोई साझी नहीं

अल्लाह का कोई साझी और शरीक नहीं है। उसकी सत्ता अखंड है। जिस प्रकार किसी राज्य में दो शासक नहीं हो सकते, उसी प्रकार पूरी सृष्टि में एक ही शासक की सत्ता संभव है। यदि किसी भी स्थान पर एक साथ दो आदेश चलाए जाएंगे तो व्यवस्था सुचारू रूप से नहीं चल सकती। क़ुरआन में है—

  • ‘‘अगर आसमान और ज़मीन में एक अल्लाह के सिवा दूसरे पूज्य होते तो (ज़मीन और आसमान) दोनों की व्यवस्था बिगड़ जाती।’’  (21:22)
    अल्लाह संपूर्ण जगत का स्रष्टा है। वह किसी के द्वारा स्रष्ट नहीं कि उसमंज स्रष्ट प्राणियों की भांति कमज़ोरियां पायी जाती हों। क़ुरआन में है—
  • ‘‘अल्लाह सबसे निरपेक्ष है और सब उसके मुहताज हैं, न उसकी कोई सन्तान है और न वह किसी की सन्तान है। और कोई उसका समकक्ष नहीं है।’’  (112:2-4)
    सारी सृष्टि अल्लाह की आज्ञाकारी है—‘‘क्या तुम देखते नहीं हो कि अल्लाह के आगे सजदे में हैं वे सब जो आसमानों में हैं और जो धरती में हैं, सूरज, चांद और तारे और पहाड़ और पेड़ और जानवर और बहुत-से इन्सान और बहुत से वे लोग जो अज़ाब के अधिकारी हो चुके हैं?’’  (22:18)
    अल्लाह ने किसी को न बेटा-बेटी बनाया और न ही अन्य किसी को साझीदार ठहराया। क़ुरआन की निम्नलिखित आयतें इन मिथ्यापूर्ण बातों का पूर्णतः खंडन करती हैं—
  • ‘‘उनका कहना है कि अल्लाह ने किसी को बेटा बनाया। अल्लाह पाक है इन बातों से। वास्तविक तथ्य यह है कि धरती और आकाशों में पायी जानेवाली सभी चीज़ों का वह मालिक है। सबके सब उसके आज्ञाकारी हैं।’’  (2:116)
  • ‘‘अल्लाह ने किसी को अपनी संतान नहीं बनाया है, और कोई दूसरा ख़ुदा उसके साथ नहीं है। अगर ऐसा होता तो हर ख़ुदा अपनी सृष्टि को लेकर अलग हो जाता और फिर वे एक-दूसरे पर चढ़ दौड़ते। पाक है अल्लाह उन बातों से जो ये लोग बनाते हैं। खुले और छिपे केा जाननेवाला, वह उच्चतर है उस शिर्क से जो ये ठहरा रहे हैं।’’  (23:91,92)
  • ‘‘लोगों ने जिन्नों को अल्लाह का साझीदार ठहरा दिया, हालांकि वह उनका पैदा करनेवाला है और उन्होंने जाने-बूझे उसके लिए बेटे और बेटियां रच दी। हालांकि वह पाक और उच्च है उन बातों से जो ये लोग कहते हैं। वह तो आकाशों और धरती का आविष्कारक है उसका कोई बेटा कैसे हो सकता है जबकि उसका कोई जीवन साथी ही नहीं है। उसने हर चीज़ को पैदा किया है और उसे हर चीज़ का ज्ञान है।’’                (6:100,101)
  • ‘‘उसके साथ किसी को साझीदार न बनाओ।’’  (6:151)

शिर्क (अनेकेश्वरवाद)

‘शिर्क’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है—शरीक करना या साझी ठहराना, अर्थात् अल्लाह के साथ किसी अन्य को शरीक करना या उसका साझी ठहराना। ईश्वर की सत्ता और उसके गुणों व अधिकारों में किसी को सम्मिलित करना या उसका साझी ठहराना शिर्क है। मानव की मूल प्रकृति इसके विरुद्ध है। पवित्र क़ुरआन में इसकी निंदा की गयी है और इससे जनसामान्य को बचने का आदेश दिया गया है।
अल्लाह शिर्क को कदापि क्षमा नहीं करता। क़ुरआन में है—

  • ‘‘अल्लाह बस शिर्क (साझीदार बनाने) ही को माफ़ नहीं करता, इसके सिवा दूसरे जितने भी गुनाह हैं वह जिसके लिए चाहता है माफ़ कर देता है।’’  (4:48)
  • ‘‘ये लोग अल्लाह के सिवा उनको पूज रहे हैं, जो इनको न हानि पहुंचा सकते हैं न लाभ और कहते हैं कि ये अल्लाह के यहां हमारे सिफ़ारिशी हैं—पाक है वह और उच्च है उस शिर्क से जो ये लोग करते हैं।’’  (10:18)
  • ‘‘इन लोगों ने अल्लाह को छोड़कर अपने कुछ ख़ुदा बना रखे हैं कि वे इनके पृष्ठपोषक होंगे। कोई पृष्ठपोषक न होगा। वे सब इनकी उपासना का इन्कार करेंगे और उल्टे इनके विरोधी बन जाएंगे।’’  (19:81,82)
  • ‘‘ख़ूब सुन लो, वास्तव में ये लोग अपनी मनगढ़ंत कहते हैं कि अल्लाह संतान रखता है और वास्तव में ये लोग झूठे हैं।’’ (37:151,152)
  • ‘‘(ऐ नबी) इनसे कहो, फिर क्या ऐ अज्ञानियों तुम अल्लाह के सिवा किसी और की बन्दगी मुझसे करने के लिए कहते हो? (यह बात तुम्हें उनसे साफ़ कह देनी चाहिए क्योंकि) तुम्हारी ओर और तुमसे पहले गुज़रे हुए सारे नबियों की ओर यह प्रकाशना भेजी जा चुकी है कि अगर तुमने शिर्क किया तो तुम्हारा सारा कर्म व्यर्थ हो जाएगा और तुम घाटे में रहोगे। अतः तुम बस अल्लाह ही की बन्दगी करो और कृतज्ञ बन्दों में से हो जाओ।’’  (39:64,65)
  • ‘‘तुम स्पष्ट रूप से कह दो कि ‘‘मुझे तो सिर्फ़ अल्लाह की बन्दगी का आदेश दिया गया है और इससे रोका गया है कि किसी को उसका साझीदार ठहराऊं, अतः मैं उसी की ओर बुलाता हूं और उसी की ओर मेरा रुजू (पलटना) है।’’ (13:36)
    ‘‘जिसने ताग़ूत का इन्कार करके अल्लाह को माना उसने एक ऐसा मज़बूत सहारा थाम लिया जो कभी टूटनेवाला नहीं।’’ (2:256)
    शिर्क करनेवाला अर्थात् अनेकेश्वरवादी/बहुदेववादी व्यक्ति आश्रयहीन, बेसहारा और दुर्दशाग्रस्त हो जाता है। उसकी हालत ऐसी हो जाती है मानो वह आकाश से गिर पड़ा हो और बुरी तरह धूल-धूसरित हो गया हो। क़ुरआन में है—
  • ‘‘एकाग्रचित होकर अल्लाह के बन्दे बनो, उसके साथ किसी को साझी न ठहराओ। और जो कोई अल्लाह के साथ साझी ठहराए तो मानो वह आसमान से गिर गया, अब तो उसे पक्षी उचक ले जाएंगे या हवा उसको ऐसे स्थान पर ले जाकर फेंक देगी जहां उसके चीथड़े उड़ जाएंगे।’’  (22:31)
  • ‘‘वही एक आसमान में भी ईश्वर है और ज़मीन में भी ईश्वर, और वही तत्वदर्शी और सर्वज्ञ है। बहुत उच्च और सर्वोपरि है वह जिसके अधिकार में ज़मीन और आसमानों और हर उस चीज़ की बादशाही है जो ज़मीन और आसमानों के बीच पायी जाती है। और वही क़ियामत की घड़ी का ज्ञान रखता है, और उसी की ओर तुम सब पलटाये जानेवाले हो। उनको छोड़कर ये लोग जिन्हें पुकार रहे हैं उन्हें किसी सिफ़ारिश का अधिकार प्राप्त नहीं, सिवाय इसके कि कोई ज्ञान के आधार पर हक़ की गवाही दे। और अगर तुम इनसे पूछो कि इन्हें किसने पैदा किया है, तो ये ख़ुद कहेंगे कि अल्लाह ने। फिर कहां ये धोखा खा रहे हैं।’’  (43:84-87)

हिन्दू धर्म में एकेश्वरवाद

वेद हिन्दू धर्म का आधार हैं। इन्हें ईश्वरीय ग्रंथ कहा जाता है। अतएव ईश्वर के वास्तविक स्वरूप और उसकी सत्ता को जानने का एक माध्यम वेद हो सकते हैं। इनमें ईश्वर के एक होने अर्थात् एकेश्वरवाद की बात बहुत खुलकर आयी है। इनमें अनेकेश्वरवाद/बहुदेववाद नहीं पाया जाता। ऋग्वेद (1-164-46), अथर्ववेद (9-10-28), ऋग्विधा॰ (1-25-7), बृहद्देवता (4-42) और निरुक्त (7-18, 14-1) नामक पुस्तकों में आया है—

इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः सुपर्णो गरुत्मान्।
एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः।।
पं॰ दामोदर सातवलेकर ने इस मंत्र का अनुवाद इन शब्दों में किया है—

‘‘एक ही सत् स्वरूप परमात्मा को अनेक प्रकार से बोलते हैं। इन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि, दिव्य, सुपर्ण, गरुत्मान्, सत्, सम, मातरिश्वा आदि नामों से एक ही परमात्मा का वर्णन करते हैं।’’ (‘‘यजुर्वेद का सुबोध भाष्य’’, पृ॰ 530)
इस मंत्र से मिलता-जुलता मंत्र यजुर्वेद (32-1) में भी आया है।
पं॰ सातवलेकर इस मंत्र के संबंध में लिखते हैं—‘‘जिस प्रकार एक ही पुरुष को पिता, भाई आदि गुणबोधक अनेक शब्द प्रयुक्त होते हैं, तथापि इन अनेक शब्दों से उस एक ही व्यक्ति का बोध होता है, उसी प्रकार अग्नि, वायु आदि अनेक गुण-बोधक शब्दों से एक ही परमात्मा का बोध होता है। इसलिए भिन्न नामों के भ्रम से अनेक-देवतावाद में फंसना किसी को भी उचित नहीं।’’ (‘‘यजुर्वेद का सुबोध भाष्य’’, पृ॰ 530)
सारी सृष्टि का एक ही ईश्वर है और वही पूजनीय व वंदनीय है। ऋग्वेद में है—

  • य एक इत्। तमुष्टिहि।  (6-45-16)
    अर्थात्, वह एक ही है। उसी को पूजो।
  • मा चिदन्यद् विशंसत। (8-1-1)
    अर्थात्, किसी दूसरे को मत पूजो।
    (उक्त दोनों मंत्रांशों के अनुवाद पं॰ गंगा प्रसाद उपाध्याय ने किये हैं।
                     —‘इस्लाम के दीपक’, पृ॰ 402, 385, अमर स्वामी प्रकाशन विभाग, ग़ाज़ियाबाद, उ॰प्र॰)
  • पतिर्बभृथासमो जनानामेको विश्वस्य भुवनस्यराजा। (ऋग्वेद 6-36-4)

अर्थात्, संसार का स्वामी जिसके समान और नहीं, वह (एक) सहायरहित प्रकाशमान राजा है।
(स्वामी दयानंद सरस्वती, ऋग्वेद भाष्य, पृ॰ 498)

  • भुवनस्य पस्यपतिरेभ एव

नमस्यो विक्ष्वीड्यः। (अथर्ववेद, 2-2-1)
अर्थात्, सब ब्रह्माण्ड का एक ही स्वामी, नमस्कार योग्य और स्तुति योग्य है। (पं॰ क्षेमकरण दास त्रिवेदी)
अथर्ववेद (2-2-2) में है—

  • एक एव नमस्यः सुशेवाः।

अर्थात्, वह एक ही है, जो नमस्कार और पूजा के योग्य है।
(पं॰ गंगा प्रसाद उपाध्याय, ‘इस्लाम के दीपक’, पृ॰ 386)
ईश्वर शरीर धरण नहीं करता। यजुर्वेद (40-8) में है—

  • स पर्य्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविर शुद्धमपापविद्धम्।
    कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽ
    अर्थान्व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः।।

श्री नारायण स्वामी ने इस मंत्र का अनुवाद इस प्रकार किया है—
‘‘वह (ईश्वर) सर्वत्र व्यापक, जगदुत्पादक, शरीर-रहित, शारीरिक विकार-रहित, नाड़ी और नस के बंधन से रहित, पवित्र, पाप से रहित, सूक्ष्मदर्शी, मननशील, सर्वोपरि, वर्तमान, स्वयंसिद्ध, अनादि प्रजा (जीव) के लिए ठीक-ठीक कर्मफल का विधान करता है।’’  (‘‘वेद रहस्य’’, पृ॰ 94, वैदिक पुस्तकालय, वाराणसी, 1972)
डॉ॰ पं॰ श्रीपाद दामोदर सातवलेकर ने इसका अनुवाद इस प्रकार किया है—‘‘वह (ईश्वर) सर्वत्र गया हुआ है। वह देहरहित, स्नायुरहित है। वह व्रणरहित है। वह पवित्र और वीर्यवान है। वह पाप से विद्व (बिंधा) हुआ नहीं है। वह मन का स्वामी है, विचारशील है। वह सबसे श्रेष्ठ व विजयी है। वह अपनी शक्ति से स्थित है। करने योग्य कार्य वह करता रहता है।’’ (‘यजुर्वेद का सुबोध भाष्य’, पृ॰ 647)
अथर्ववेद (13-4-16 से 18, 20, 21) में उसकी अविभाज्यता का स्पष्ट शब्दों में उल्लेख आया है—

  • न द्वितीयो न तृतीयश्चतुर्थो नाप्युच्यते ।।16।।
    न पंचमो न षष्ठः सप्तमो नाप्युच्यते ।।17।।
    नाष्टमो न नवमो दशमो नाप्युच्यते ।।18।।
    तमिदं निगतं सहः स एष एक एकवृदेक एव ।।20।।
    सर्वे अस्मिन् देवा एकवृतो भवन्ति ।।21।।

दयानन्द सरस्वती जी इन मंत्रों का भावार्थ व्यक्त करते हुए लिखते हैं—
‘‘इन सब मंत्रों से यह निश्चय होता है कि परमात्मा एक ही है, उससे भिन्न कोई न दूसरा, न तीसरा, न कोई चैथा परमेश्वर है। (16) न पांचवां, न छठा, और न कोई सातवां ईश्वर है। (17) न आठवां, न नौवां, और न कोई दसवां ईश्वर है। (18) किन्तु वह सदा एक अद्वितीय ही है। उससे भिन्न दूसरा कोई भी नहीं। ...वह अपने काम में किसी की सहायता नहीं लेता, क्योंकि वह सर्वशक्तिमान है। (20) उसी परमात्मा की सामर्थ्य में वसु आदि सब देव अर्थात् पृथ्वी आदि लोक ठहर रहे हैं और प्रलय में भी उसकी सामर्थ्य में लय होकर उसी के बने रहते हैं। (21)  (‘‘दयानन्द ग्रंथ-माला’’, (द्वितीय खंड), पृ॰ 337,338)
इसी से मिलता-जुलता अनुवाद पं॰ क्षेमकरण दास त्रिवेदी और पं॰ सातवलेकर ने किया है। अलबत्ता इन मंत्रों की क्रम संख्या में समानता नहीं है।
ईश्वर के एकत्व की बात ऋग्वेद (1-164-6, 3-54,8, 8-58-2, 10-82-3, 10-82-6, 10-82-7, 10-129-2 और 10-129-3), अथर्ववेद (10-2-23, 10-7-21, 10-8-6, 10-8-11, 10-8-28 और 10-8-29) के अतिरिक्त यजुर्वेद (32-8, 32-9, 40-4, 40-5) में भी आयी है।
(‘‘विश्व ज्योति’’, वेद अंक, पृ॰ 164 से 169, डॉ॰ विश्व बंधु के आलेख से उद्धृत, होशियारपुर जून-जुलाई 1972)
इन मंत्रों में ईश्वर के एक होने, उसी के पूर्व सामर्थ्यवान होने और उसकी तत्वदर्शिता का बहुत ही खुलकर उल्लेख हुआ है। डॉ॰ पी॰वी॰ काणे के अनुसार ऋग्वेद के 8-58-1 और 10-129-2 मंत्रों में भी ईश्वर के एक होने का वर्णन है। डॉ॰ काणे महाभारत और कुछ पुराणों के अतिरिक्त कुमार संभव (7-44) में भी एकेश्वरवाद की धरणा के पाए जाने की बात कहते हैं और निम्नलिखित हवाले पेश करते हैं—
वन पर्व (39-76, 77), शांति पर्व (343-131), ब्रह्म पुराण (192-51), विष्णु पुराण (5-18-50) और हरिवंश (विष्णु पुराण 25-31)।
(‘‘धर्मशास्त्र का इतिहास’’, (पंचम भाग), पृ॰ 393)
एक ईश्वर ही के होने का तथ्य इन मंत्रों में भी पाया जाता है: ऋग्वेद (10-12-3, और (10-12-11), यजुर्वेद (13-4, 23-1 और 23-3)। इनके अतिरिक्त वेदों में और भी मंत्र मिलते हैं, जो एकेश्वरवाद की धारणा का प्रतिपादन करते हैं। अतः वेदों में बहुदेववाद की धरणा नहीं पायी जाती। इस सत्य के विपरीत किसी प्रकार के प्रयास को अनुचित ही कहा जाएगा।
ईश्वर वास्तविक सम्राट है, किन्तु उसकी कोई प्रतिमा (मूर्ति) नहीं है। वह सम्राट है (इन्द्रश्च सम्राड्, यजुर्वेद 8-37), वह चल-अचल का राजा है (इन्द्रो पातोडवसितस्य राजा, यजुर्वेद, 36-8), उससे श्रेष्ठ कोई नहीं (यस्मान्नान्यत्परमस्ति भूतम्, यजु॰ 32-6), इसकी कोई प्रतिमा नहीं (न तस्य प्रतिमाडअस्ति, यजु॰, 32-3)।   
(‘‘यजुर्वेद का सुबोध भाष्य’’, पृ॰ 551)
गुणों का उल्लेख इस प्रकार किया है—वह पोषक है (पूषा) वह एक ज्ञानी है (एक ऋषिः) वह नियायक है (यमः) वह प्रकाशक है (सूर्यः) वह पालक शक्ति से युक्त है (प्रजापत्य: 40-16) वह उत्तम मार्ग से ऐश्वर्य की ओर ले जाता है (सुपथारपेनयरति), वह सब कर्मों को जानता है (विश्वानिवयुनानि विद्वान) वह कुटिलता और पाप से युद्ध करता है (जुहुराणां एनः युध्यते: 40-18)।    
(‘‘यजुर्वेद का सुबोध भाष्य’’, पृ॰ 648)
ऋग्वेद (1-4-1 से 5) में है—

  • सुरूपकृत्नुमूतये सुदुघामिव गोदुहे।
    जुहूमसि द्यविद्यवि।1।।
    उप नः सवनागहि सोमस्य सोमपाः पिब।
    गोदा इद्रेवतो मदः।2।।
    अथा ते अन्तमानां विद्याम सुमतीनाम।
    मा नो अतिख्या आगहि।3।।
    परेहि विग्रमस्तृतमिन्द्रं पृच्छा विपश्चितम्।
    यस्ते सखिभ्य आ वरम्।4।।
    उत ब्रुवन्तु नो निदो निरन्यतश्चिदारत।
    दधना इन्द्र इददुवः।5।।

पं॰ दुर्गाशंकर सत्यार्थी ने इन मंत्रों का अनुवाद इस प्रकार किया है—
‘‘सुन्दर रूपों वाली मूर्ति बनाकर, गाय दुहकर (अपनी समझ में) और द्यवि द्यवि अर्थात् दिवि दिवि अर्थात् संपूर्ण पृथ्वी में ये उन मूर्तियों की उपासना करते हैं। (1) ये हमारे सब (मार्गों का) परित्याग कर चन्द्रमा की महत्ता (अर्थात् चन्द्रमा को देखते हुए भी हमारी शक्ति) भूलकर शराब पीते हैं। (अर्थात् मूर्तिपूजक ईश्वर की शक्ति एवं सामर्थ्य का विस्मरण कर मूर्तिपूजा में चूर रहते हैं) ये नशे की गोद में दुराचारियों के समान सो गए हैं। (2) वे अन्तिम दिन का विस्मरण कर विधा एवं बुद्धि का तिरस्कार कर हमारी निश्चित की हुई सीमा को पकड़ रहे हैं। (3) अपनी विस्तृत इन्द्रियों से परे ये विपत्तियों का ठिकाना पूछते हैं। जो ऐसे साथियों के लिए परम अर्थात् श्रेष्ठ हैं (हम उन्हें विपत्तियां ही देंगे) (4) और ये हमारी निन्दा करते हैं। तुम जो कि अपनी इन्द्रियों को वश में करनेवाले हो, हमारा स्तवन करो। और विधर्मियों को इस देश से दूर भाग जाने को कहो अर्थात् उन्हें देश से निकाल दो, वे पवित्र आर्यावर्त में रहने योग्य नहीं हैं। (5)
(मधुर उपहार, पृ॰ 128, 129, मर्कज़ी मक्तबा इस्लामी)
यजुर्वेद में भी कई ऐसे मंत्र हैं, जिनके द्वारा एक ईश्वर की भक्ति पर बल दिया गया है। उसे छोड़कर अन्य की भक्ति करने वाले को चेतावनी दी गयी है। कुछ मंत्रों पर दृष्टिपात कीजिए—

  • ईशा वास्यमिदम् सर्व यत्किं च जगत्यां जगत।
    तेन त्यक्त्तेन भुत्र्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्वनम्।।
    (यजुर्वेद, 40:1)

स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने इस मंत्र का निम्नलिखित शब्दों में अनुवाद किया है—‘‘हे मनुष्य! जो कुछ इस संसार में जगत् है उस सब में व्याप्त होकर जो नियंता है वह ईश्वर कहाता है। उससे डरकर तू अन्याय से किसी के धन की आकांक्षा मत कर। उस अन्याय के त्याग और न्यायाचरणरूप धर्म से अपने आत्मा से आनन्द को भोग। (सत्यार्थ प्रकाश, समुल्लास: 7)
इसी वेद में है—

  • अन्धन्तमः प्रविशन्ति येडसंभूतिमुपासते।
    ततो भूयडइव ते तमो यडउसम्भूत्याम् रताः।। (यजुर्वेद, 40:9)

भावार्थ—‘‘जो ‘असंभूति’ अर्थात् अनुत्पन्न अनादि प्रकृति कारण की ब्रह्म के स्थान में उपासना करते हैं वे अंधकार अर्थात् अज्ञान और दुःख सागर में डूबते हैं। और संभूति जो कारण से उत्पन्न हुए कार्य रूप पृथ्वी आदि भूत, पाषाण और वृक्षादि अवयव और मनुष्यादि के शरीर की उपासना ब्रह्म के स्थान पर करते हैं, वे उस अंधकार से भी अधिक अंधकार अर्थात् महामुर्ख चिरकाल घोर दुःख, नरक में गिरके महाक्लेश भोगते हैं।’’ (सत्यार्थ प्रकाश, समुल्लास: 11)
गीता में एकेश्वरवाद
श्रीमद् भगवद् गीता में है—

  • अंतवन्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्।
    देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि।।
    अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्वयः।
    परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्।।
    नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः।
    मूढोडयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्।।
    (अध्याय, 7:23-25)

अर्थात् जो मेरे अतिरिक्त किसी और को पूजते हैं, वे उसी को प्राप्त होते हैं। (अर्थात् पत्थर, नदी, पहाड़ों को पूजनेवालों को पत्थर, नदियां और पहाड़ों की ही प्राप्ति होती है) किन्तु मुझे पूजनेवाले मुझ तक पहुंच जाते हैं। ऐसा होने पर भी सब मनुष्य मुझे नहीं पूजते (इसका कारण यह है कि बुद्धिहीन पुरुष मेरे अनुत्तम अर्थात् जिससे उत्पन्न कुछ भी नहीं ऐसे अविनाशी परमभाव को तत्व से न जानते हुए मन इन्द्रियों से घिरे मुझको मनुष्यों की भांति मानते हैं। मैं उनके सामने प्रत्यक्ष नहीं होता हूं। इसलिए अज्ञानी मनुष्य मुझ जन्मरहित अविनाशी परमात्मा को तत्व से नहीं जानते हैं और मुझे जन्म लेने तथा मरनेवाला समझते हैं।’’             
(अनुवाद: दुर्गाशंकर सत्यार्थी, मधुर उपहार, पृ॰ 123, मर्कज़ी मक्तबा इस्लामी)
एक अन्य श्लोक में ईश्वर को अजन्मा बताया गया है। श्लोक निम्नलिखित है—

  • नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः।
    मूढोडयं नभिजानाति लोको मामजमव्ययम्।। (7:25)

श्री जयदयाल गोयन्दका ने इस श्लोक का अनुवाद इस प्रकार किया है—
‘‘अपनी योगमाया से छिपा हुआ मैं सबके प्रत्यक्ष नहीं होता, इसलिए यह अज्ञानी जनसमुदाय मुझ जन्मरहित अविनाशी परमेश्वर को नहीं जानता अर्थात् मुझको जन्मने-मरनेवाला समझता है।’’ (‘‘गीता तत्व-विवेचनी’’, पृ॰ 323)
उपनिषदों में एकेश्वरवाद
उपनिषदों में भी एकेश्वरवाद की धारणा पायी जाती है। कुछ उपनिषद तो वेद मंत्र ही हैं, जैसे शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन शाखा और काण्व शाखा की संहिताओं के अन्तिम अध्याय को ईशोपनिषद या ईशावास्योपनिषद (माध्यन्दिन) और ईशोपनिषद या ईशावास्योपनिषद (काण्वीय) कहा जाता है। इसी प्रकार के कुछ और उपनिषद हैं। श्वेताश्वेतरोपनिषद (3-1,2) में एकेश्वरवाद को इस प्रकार निरूपित किया गया है—

  • य एको जालवानीशत ईशनीभिः सर्वांल्लोकनीशत ईशनीभिः।
    य एवैक उद्भवे संभवे च य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति।।1।।
    एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुर्य इमांल्लोकानीशत ईशनीभिः।
    प्रत्यडनांस्तिष्ठति संचुकोपान्तकाले संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपा।।2।।

पं॰ श्रीराम शर्मा आचार्य ने इन श्लोकों का निम्नलिखित शब्दों में अनुवाद किया है—
‘‘विश्वरूप जाल का स्वामी अपनी प्रभु-सत्ता द्वारा संसार पर प्रभुत्व रखता है। वह सब लोकों का नियामक अकेला ही सृष्टि रचना करने और उसे विस्तृत करने में समर्थ है। उसे जो ज्ञानीजन जान लेते हैं, वे अमृत्व को प्राप्त होते हैं। जो अपनी शक्तियों से सब लोकों पर प्रभुत्व रखता है वह रुद्र एक ही है, इसलिए अन्य का आश्रय ज्ञानियों ने नहीं लिया। वह सभी देहधारियों में स्थित होकर लोक रचना करता हुआ सबकी रक्षा करता है और सृष्टि के लय काल (प्रलय) में सबको अपने भीतर समेट लेता है।
(‘‘108 उपनिषद’’, (ज्ञान खंड), पृ॰ 302,303, संस्कृति संस्थान, बरेली, संशोधित संस्करण: 1990)
एक ही ईश्वर के अनेक नाम हैं। कैवल्योपनिषद (8) में आया है—

  • स ब्रह्मा स शिवः सेन्द्रः सोडक्षरः परमः स्वराट्।
    स एव विष्णुः स प्राणः स कालोडग्निः स चन्द्रमाः।।8।।

डॉ॰ रणजीत सिंह शास्त्री ने इसका अनुवाद इस प्रकार किया है—
‘‘यह ईश्वर ही ब्रह्मा है, वही विष्णु है, वही रुद्र है, वही शिव है, वही अक्षर है, वही स्वराट् है, वही इन्द्र है, वही कालाग्नि है और वही चन्द्रमा है।
(‘‘ईश्वर की सत्ता और उसका स्वरूप’’, पृ॰ 28, 29,
मधुर प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण: 1992)
ईश्वर एक है, वह अद्वितीय है (एकमेवाद्वितीयम्-छान्दोग्योपनिषद, 6-2-1)। उससे श्रेष्ठ कोई नहीं (श्वेताश्वतरोपनिषद, 3-9)। उसके अनेक रूप नहीं। उसे जो अनेक रसों में मानते हैं, उनको सावधान करते हुए कठोपनिषद (द्वितीय अध्याय, प्रथम बल्ली) में कहा गया है—

  • ‘‘यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह।
    मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ।।10।।
    मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किंचन।
    मृत्योः स मृत्यु गच्छति य इह नानेव पश्यति।।11।।

पं॰ श्रीराम शर्मा आचार्य के शब्दों में इन श्लोकों का अनुवाद इस प्रकार है—
‘‘जो मनुष्य इहलोक (संसार) में परमेश्वर को अनेक रूपों वाला देखता है, वह मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है...यह सत्य मन के द्वारा ही प्राप्त हो सकता है। इस लोक में अनेकत्व किंचित नहीं है। जो मनुष्य अनेकत्व देखता है, वह मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है।’’ (‘‘108 उपनिषद’’, (ज्ञान खंड), पृ॰ 46, 47)
यजुर्वेद (40-9) में भी इसकी ओर संकेत है—
‘‘जो लोग परमेश्वर को छोड़कर अन्य की उपासना करते हैं, वे अज्ञान-अंधकार में प्रविष्ट होते हैं और जो व्यसनों में रत हैं, वे और भी अधिक अंधकार में पड़े हैं।’’       
(अनुवाद: राज बहादुर पाण्डेय, ‘‘यजुर्वेद’’,
                                   (संक्षिप्त), पृ॰ 159, डायमंड पाकेट बुक्स)
ईश्वर के वास्तविक स्वरूप, उसके गौरव और प्रताप के विषय में वेदों, उपनिषदों और श्रीमद् भगवद्गीता में जो चीज़ें मिलती हैं, उनमें से मात्र कुछ को ही उपर्युक्त विवरणों में प्रस्तुत किया गया है।
अतएव हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि ईश्वर एक है, अकेला है, अद्वितीय और अविनाशी है। उसका कोई साक्षी नहीं। उसके अनेक नाम हैं, किन्तु उसका कोई रूप नहीं। उसका न तो कोई शरीर है और न ही वह शरीर ग्रहण करता है। वह सारे ब्रह्माण्ड का स्वामी है, नियामक है, पालनकर्ता, स्रष्टा और संहारक भी है। वह प्रत्येक कार्य करने में समर्थ और सबसे अधिक शक्तिशाली है। वही संपूर्ण जगत का सम्राट है। उस जैसा कोई नहीं।

कपोल-कल्पित अवधारणा के दुष्परिणाम

ईश्वर के इन और अन्य गुणों एवं विशेषताओं के विरुद्ध जो बातें कही जातीं हैं उनकी हैसियत बस इतनी है कि वे वास्तविकता से परे और कल्पना पर आधारित हैं। शाश्वत सत्य अपने आप में सत्य होता है। उसे किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती है।
अगर हम किसी प्रमाण की भी बात करें तो पूरी सृष्टि में जिधर भी नज़र डालें एक मात्र ईश्वर की धारणा के प्रमाण ही प्रमाण नज़र आएंगे। पूरा ब्रह्माण्ड और समग्र सृष्टि कितनी सुव्यवस्थित, क्रमबद्ध और संतुलित है, हम सहज ही समझ व देख सकते है। इसकी नियमितता और विधेयात्मकता आश्चर्यचकित करनेवाली है। इसमें ज़रा भी स्वच्छंदता और प्रतिफलित होनेवाले परिवर्तन नहीं हैं। अतः हम देखते हैं कि अल्लाह द्वारा सभी स्रष्ट चीज़ों में तत्वदर्शिता, बुद्धिमत्ता, पूर्णता, सौंदर्य, उपयोगिता और नैतिक प्रयोजन सब कुछ विद्यमान है। सूर्य और चन्द्रमा की गतियों का भी यही हाल है। यदि ईश्वर अनेक हो जाए, तो प्रत्येक की अपनी-अपनी प्रभुसत्ता और महत्वाकांक्षा के अनुकूल सृष्टि में अव्यवस्था उत्पन्न कर दे और वह छिन्न-भिन्न होकर रह जाए।
तार्किक और बौद्धिक सभी दृष्टियों से यदि हम विचार करते हैं, तो हम इस वास्तविकता और सच्चाई को स्वमेव पा जाते हैं कि ईश्वर का अस्तित्व है, वह एक है, उसका कोई साझी नहीं, उसी के पास सर्वाधिकार है, वह सर्वशक्ति-सम्पन्न है। उसका और उसकी सत्ता का इन्कार वास्तव में ईश्वर की महानता और शान में धृष्टता है।
एक ही ईश्वर को न मानना और उसका साझी ठहराना सर्वशक्ति-सम्पन्न ईश्वर का अपमान और अनादर है। यह केवल मनुष्य की ईश्वर के प्रति धृष्टता ही नहीं, एक गंभीर विश्वासघात भी है। स्पष्ट है, जब मनुष्य उस सृजनकार-सत्ता के साथ विश्वासघात करेगा, जिसने उसे पैदा किया है, तो यह अपराध कितना गंभीर हो जाएगा इस तथ्य को सहज ही समझा जा सकता है। यह विश्वासघात चरित्र पर आघात करेगा और जीवन में भांति-भांति के विकार पैदा कर देगा। एकेश्वरवाद वह मज़बूत आश्रय है, जिससे वंचित होकर एवं ईश्वर से अपने नैसर्गिक व मधुरिम संबंध का विच्छेद करके मनुष्य भ्रम, संशय और दुर्बलता की स्थिति में आकर अपने जीवन को विभिन्न प्रकार के विकारों, व्याधियों और झंझावातों में डाल देता है। उसके जीवन में आशा, उत्साह, उमंग, साहस और कर्मठता, उत्तरदायित्व जैसे उत्तम गुण क्षीण हो जाते हैं और इनके विपरीत भाव जन्म लेकर बढ़ने लगते हैं, जो लौकिक जीवन को कष्टकर बनाते ही हैं, पारलौकिक जीवन को भी असफल बना देते हैं। तात्पर्य यह कि अनेकेश्वरवादी, बहुदेववादी व्यक्ति के व्यक्तित्व का वांछित विकास बाधित और खंडित हो जाता है। इस प्रकार वह मनुष्यत्व और पुरुषार्थ से अपना संबंध तोड़ डालता है, जो सही अर्थों में एक ईश्वर पर विश्वास के परिणामस्वरूप जीवन में उद्भूत और पैदा होते हैं। एकेश्वरवाद के बिना मानव जगत में वास्तविक भाईचारे व एकत्व की बुनियाद नहीं क़ायम की जा सकती है। यह ऐसी धारणा है जो जब भी कमज़ोर पड़ेगी मानव एकत्व व भाईचारा खंडित होगा और इसके नतीजे में विषमतामूलक शोषणकारी समाज जन्म लेगा। यह भी मनुष्य पर ईश्वर का महान उपकार है कि उसने अपने अतिरिक्त अन्य के समक्ष उसका सिर झुकने से बचा लिया। इस प्रकार उसके आत्मसम्मान और उसकी गरिमा को सुरक्षित रखा और उसे अधमता व हीनता से बचा लिया।
अतः मनुष्य का परम कर्तव्य है कि वह मात्र ‘एक ईश्वर’ की भक्ति और बन्दगी करे जो सर्वशक्तिमान, निराकार, न्यायकारी, क्षमाशील, दयावान, अजन्मा, अनुपम, अजर, अमर, निर्विकार, अनन्त, सर्वाधर, सर्वव्यापक, सर्वसत्ताधरी, सर्वान्तरयामी, पवित्र और सृष्टिकर्ता है।
क़ुरआन में है—
‘‘अल्लाह वह जीवन्त शाश्वत सत्ता है, जो सम्पूर्ण जगत को संभाले हुए है, उसके सिवा कोई प्रभु, पूज्य नहीं है। वह न सोता है और न उसे ऊंघ लगती है। ज़मीन और आसमानों में जो कुछ है, उसी का है। कौन है जो उसके सामने उसकी अनुमति के बिना सिफारिश कर सके? जो कुछ बन्दों के सामने है उसे भी वह जानता है और उसके ज्ञान में से कोई चीज़ उनके ज्ञान की पकड़ में नहीं आ सकती यह और बात है कि किसी चीज़ का ज्ञान वह ख़ुद ही उनको देना चाहे। उसका राज्य आसमानों और ज़मीन पर छाया हुआ है और उसकी देखरेख उसके लिए कोई थका देनेवाला काम नहीं है। बस वही एक महान और सर्वोपरि सत्ता है।’’ (क़ुरआन, 2:255)

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