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एकेश्वरवाद की मूल धारणा
   

ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकारना मात्र तर्क और बुद्धि का विषय नहीं है, बल्कि यह इन्सान के दिल की आवाज़ है, मन की मांग है, अंतःकरण की पुकार है। ईश्वर में विश्वास मानव-प्रकृति को अभीष्ट है। इस विश्वास और धारणा का मानव-व्यक्तित्व से गहरा संबंध है। यह संबंध फूल और उसकी सुन्दरता, अग्नि और ज्वाला, जल और प्रवाह जैसा है। संपूर्ण जगत ईश्वरीय प्रभाव के अन्तर्गत क्रियाशील है। स्वयं मानव-शरीर की आंतरिक क्रियाएं स्वचालित रूप से ईश्वरीय विधान के अनुसार कार्य संपन्न कर रही हैं। श्वास-क्रिया-पाचन क्रिया, रुधिर-संचार आदि समस्त कार्य संचालित हैं। इसी प्रकार मनुष्य की आत्मा भी ईश-आज्ञापालन चाहती है। यही वह बिन्दु है जो धर्म और ईश्वरवाद की आधारशिला है। वास्तविकता यह है कि ईश्वर जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई है, जिसे अस्वीकार करने से जीवन की सार्थकता समाप्त हो जाती है। ईश्वर के प्रति अपनी धारणा को विशुद्ध बनाना हमारा कर्तव्य है। हमारे चेतना-पट पर दुनिया कुछ इस प्रकार छाई रहती है कि हम स्वयं अपनी आत्मा की ओर ध्यान नहीं दे पाते, ईश्वर और उसके अस्तित्व पर चिंतन नहीं करते। उसको जानने की लालसा तो पायी जाती है, परन्तु गंभीरता से नहीं क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति कहीं न कहीं टिका है और उसी में मगन है। ईश्वर के समीप होने तथा उसे जानने के लिए उत्कृष्ट इच्छा तथा साहसिक प्रयास ज़रूरी हैं।
संसार में मनुष्य अपने चारों ओर विभिन्न प्रकार की लीलाएं घटित होते देखता है। ध्यानपूर्वक तथा सूक्ष्मता से निरीक्षण किया जाए तो पता चलता है कि स्वयं उसका अपना अस्तित्व भी किसी चमत्कार से कम नहीं है। संसार की सभी चीज़ें एक व्यवस्था में बंधी दिखाई देती हैं। प्रातः सूर्य का उदय होना और सायंकाल को ओझल हो जाना। रात में आकाश का तारों से सुशोभित होना। महकते फूल, हरी-भरी वनस्पति, पशु-पक्षी, नदी-नाले, झरने, पर्वतमालाएं जिधर निगाह जाती है अद्भुत नज़ारा देखने को मिलता है। किसी महान कारीगर की कारीगरी दिखाई देती है। यह सारी सृष्टि उद्देश्यपूर्ण है, उपयोगिता प्रदान करनेवाली है। इन्सान को जिन-जिन चीज़ों की आवश्यकता है, वे सभी यहां मौजूद हैं। आवश्यकता-पूर्ति के साथ सौंदर्यबोध का भी पूरा ख़्याल रखा गया है।
हम यह भी देखते हैं कि ब्रह्माण्ड की समस्त वस्तुओं और सारी शक्तियों में परस्पर समन्वय तथा सहयोग पाया जाता है, जिसे किसी संयोग का परिणाम नहीं कहा जा सकता। इस जगत और मनुष्य का अस्तित्व सदा से नहीं है अर्थात् इसकी रचना छुपी है। क्या किसी रचना की कल्पना रचनाकार के बग़ैर संभव है? यह प्रश्न क़ुरआन में है—
‘‘क्या ईश्वर के बारे में कोई संदेह है जो आकाश-समूह और धरती का रचयिता है।’’  (क़ुरआन, 14:10)
जब धरती और आकाश के अस्तित्व में हमें संदेह नहीं तो उनके सृष्टिकर्ता के विषय में हम क्यों संदेह में पड़े हुए हैं। स्वयं मनुष्य का अपना अस्तित्व किसी महान रचनाकार की चमत्कारिक रचना की गवाही के लिए पर्याप्त है। अखिल जगत की अन्य चीज़ें भी गवाही दे रही हैं।
इतना ही नहीं कि ईश्वर इस संपूर्ण जगत का रचनाकार है, बल्कि इसका संचालन एवं प्रबंधन भी उसी के द्वारा संपन्न हो रहा है। अरबों-खरबों वर्ष से उसी लगे-बंधे ढंग से यहां गतिविधियां चल रही हैं। सूर्य का प्रकाश वही है, ऊर्जा वही है, धरती के विभिन्न भागों पर किरणें पहुंचना वही है, चन्द्रमा का चक्र नहीं बदला, जल प्रबंधन वही है, पेड़-पौधों के उगने का नियम भी अपरिवर्तित है, अर्थात् निर्माण के साथ-साथ प्रबंधन एवं संचालन भी उसी ईश्वर का है।

वही अकेला

और यह समस्त कार्य वह ‘अकेले’ ही कर रहा है। इसका प्रमाण वह अति उत्तम समन्वय है जो प्रकृति में पाया जाता है। समुद्र के पानी का बादलों के रूप मंं उठना, इन बादलों का हवाओं द्वारा धरती के विभिन्न भागों तक पहुंचना, फिर वहां वर्षा होना और इसी प्रकार दूसरी अनेक प्रक्रियाएं जिस समन्वित ढंग से संपन्न हो रही हैं वह ईश्वर के एक होने पर दलील हैं। किसी कालेज के कई प्रधानाचार्य, किसी फैक्ट्री के कई मुख्य प्रबंधक होने यदि संभव नहीं हैं, तो इस सृष्टि के कई ईश्वर संचालक, स्वामी प्रबंधक कैसे संभव हैं? ईश्वर के अस्तित्व में संदेह करना अथवा उसके अधिकारों में किसी दूसरे/दूसरों को साझी ठहराना न तो तर्कसंगत है और न ही न्यायसंगत।

एक प्रश्न

यहां यह प्रश्न किया जा सकता है कि यदि ईश्वर है तो अपने होने की सूचना क्यों नहीं देता? इसके उत्तर में हम कहेंगे कि उसने सदैव सूचना दी, अपने संदेशवाहकों के द्वारा। मानव-इतिहास में ईशदूतों की लंबी श्रृंखला है। उन सब की मूल शिक्षाएं समान रही हैं। सबने एक ईश्वर की उपासना, दासता और आज्ञापालन की ओर लोगों को बुलाया, जीवनयापन का वह मार्ग सुझाया जो ईशप्रदत्त था, जिस पर चलकर वह इस लोक और परलोक में सुख-शांति और आनन्द प्राप्त कर सकते थे। हर युग, हर क्षेत्र, हर समुदाय में ये महापुरुष आते रहे। जब मनुष्य ने सभ्यता के वैश्विक युग में प्रवेश किया तो ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) को विश्वव्यापी संदेश के साथ भेजा गया। यह संदेश दो रूपों में उपलब्ध है। एक ईशवाणी जो पवित्र क़ुरआन में पूर्ण रूप से सुरक्षित है, दूसरे हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) के कथन, आचरण, आदेश-निर्देश जिन्हें ‘हदीस’ कहा जाता है। इस्लामी धारणा के अनुसार ईश्वर के सभी संदेशवाहकों में आस्था ज़रूरी है, हां वर्तमान व्यवहार के लिए हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) का अनुसरण करना चाहिए, क्योंकि यह ईश्वरीय विधान का अंतिम ‘संस्करण’ है।

ईशदूतों की शिक्षा सार

ईशदूतों, पैग़म्बरों की विशुद्ध शिक्षा वास्तव में ईश्वरवाद ही नहीं एकेश्वरवाद पर आधारित है। उनकी शिक्षा का सार यही है कि हमारा और इस सृष्टि का रचयिता अल्लाह है इसलिए पूज्य केवल वही है। वह सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञानी है। इस सृष्टि की हर चीज़ उस पर आश्रित है, वह किसी पर आश्रित नहीं है। वह समस्त कमज़ोरियों से परे है। वह सर्वशक्ति-संपन्न है, इसलिए इस विशाल जगत का निर्माण, पोषण और प्रबंधन उसके लिए थका देने वाला कार्य नहीं है। वह किसी की संतान नहीं है, न उसकी कोई संतान है इसलिए वह निष्पक्ष निर्णय लेने में सक्षम है। दुनिया की हर चीज़ उसका आज्ञापालन कर रही है। ग्रह, तारे, सूर्य, चन्द्रमा, हवाएं, पशु-पक्षी, वनस्पति सब उसी के क़ानून में जकड़े हुए हैं। मनुष्य को विचार एवं कर्म की स्वतंत्रता परीक्षा के उद्देश्य से अवश्य दी गयी है फिर भी उसकी भौतिक क्रियाएं, उसकी इन्द्रियां उन्हीं नियमों के अंतर्गत क्रियाशील हैं। सत्ता, प्रभुसत्ता, शासन उसी का है। जीवन-मरण उसी के हाथ है, भाग्य विधाता वही है। मनुष्य के अच्छे-बुरे कर्मों पर पुरस्कार या दंड देने का वही अधिकारी है। ईश्वरत्व के इन समस्त गुणों में उसका कोई साझी नहीं, इसीलिए मनुष्य को उसी के प्रति समर्पित होना चाहिए, उपासना उसी की करें, मदद उसी से मांगे, कृतज्ञता उसी के प्रति दर्शाए। वर्तमान जीवन की सुख-शांति और पारलौकिक जीवन की सफलता तथा मुक्ति के लिए ईश्वर द्वारा भेजे गये नियमों व सिद्धांतों का ईमानदारी से पालन करना चाहिए।

मानव-जीवन पर एकेश्वरवाद का प्रभाव

एकेश्वरवाद मानव-जीवन पर दूरगामी प्रभाव डालता है—

  1. एक ईश्वर में आस्था रखने वाले व्यक्ति का दृष्टिकोण अतिव्यापक हो जाता है। वह एक ऐसी सत्ता को पूज्य प्रभु मानता है, जो धरती और आकाश को बनाने वाली और पोषण करनेवाली है। इस ईमान के बाद जगत की कोई चीज़ भी उसे ‘पराई’ नहीं लगती। उसकी हमदर्दी, प्रेमभाव और सेवाभाव संकुचित नहीं रह जाता।
  2. एक ईश्वर को पाकर वह आत्म-सम्मान के शिखर पर पहुंच जाता है। अपनी बड़ी-बड़ी आवश्यकताओं के लिए, जिन्हें पूरी करना किसी के बस में न हो, वह उसी के आगे हाथ फैलाता है और उसी से प्रार्थना करता है।
  3. उसे धैर्य और साहस प्राप्त होता है। कोई संकट उसे सन्मार्ग से विचलित नहीं कर सकता। वीरता, निडरता तथा त्याग की भावना से वह परिपूर्ण होता है। अहंकार और घमंड उसमें नहीं होता। लोभ-लालच ईर्ष्या, घृणा, ऊंच-नीच, छूत-छात के भेदभाव समाप्त हो जाते हैं क्योंकि अब सभी मनुष्य एक ही ‘कुटुम्ब’ के हैं ईश्वर के कुटुम्ब के। ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) के एक प्रसिद्ध प्रवचन में कहा गया है कि ‘‘सृष्टि ईश्वर का कुटुम्ब है...।’’
  4. ऐसा व्यक्ति जो ईश्वर में विश्वास रखता है और उसके भेजे हुए आदेशों को स्वीकार करता है और उन शुभ सूचनाओं और चेतावनियों से अनभिज्ञ नहीं होता जो ईश्वर ने अपने रसूलों के द्वारा प्रसारित की हैं, वही इस योग्य होता है कि अपने दायित्व को पूर्ण रूप से निभा सके। ऐसा व्यक्ति अपने शरीर और आत्मा दोनों पर ईश्वर का अधिकार स्वीकार करता है, फिर यह असंभव है कि वह अपने आंतरिक या बाह्य जीवन को अपवित्र रखे, अर्थात् पाप, अत्याचार, भ्रष्ट आचार व अन्याय, अनैतिकता व दुष्कर्म आदि से दूषित रखे।
  5. वास्तविक एकेश्वरवाद का अभीष्ट प्रमाण यह है कि मनुष्य स्वेच्छापूर्वक अपने आपको ईश्वर के आगे अर्पण कर दे। अपनी इच्छाओं को ईश्वर की पसन्द के अनुरूप ढाले। जातीय एवं राष्ट्रीय भावना उसकी दृष्टि को संकुचित न कर सके । एकेश्वरवादी व्यक्ति की केवल उपासना एवं वन्दना ही ईश्वर के लिए नहीं होती, बल्कि उसका संपूर्ण जीवन उसी को समर्पित होता है। क़ुरआन में है—
    ‘‘कह दो मेरी उपासना, मेरी क़ुरबानी, मेरा जीना और मरना अल्लाह के लिए है जो सारे संसार का पालनहार है।’’ (क़ुरआन, 6:162)

क़ुरआन एवं अन्य धर्मग्रंथों की शिक्षा

पवित्र क़ुरआन विशुद्ध एकेश्वरवाद की शिक्षा देता है। एक तिहाई से अधिक शिक्षाएं इसी विषय को समर्पित हैं। अन्य प्रमुख धर्मग्रंथों—वेद तथा बाइबल की मूल एवं विशुद्ध शिक्षाएं एकेश्वरवाद ही की घोषणा करती हैं। तीनों ग्रंथों के कुछ चयनित अंश नमूने के रूप में प्रस्तुत है—

पवित्र क़ुरआन

पवित्र क़ुरआन का एक छोटा—चार वाक्यों पर आधरित-अध्याय ईश्वर के बारे में अति सुन्दर शिक्षा देता है—
‘‘कहो, वह अल्लाह है, यकता। अल्लाह सबसे निरपेक्ष है और सब उसके मुहताज हैं। न उसकी कोई संतान है और न वह किसी की संतान। और कोई उसका समकक्ष नहीं है।’’ (क़ुरआन, 112:1-4)

  • ईश्वर और उसके गुणों का वर्णन इस प्रकार है—
    ‘‘अल्लाह, वह जीवंत शाश्वत सत्ता, जो संपूर्ण जगत को संभाले हुए है उसके अतिरिक्त कोई पूज्य प्रभु नहीं है। वह न सोता है और न उसे ऊंघ लगती है। धरती और आकाशों में जो कुछ है उसी का है। कौन है जो उसके सामने उसकी अनुमति के बिना सिफ़ारिश कर सके? जो कुछ बन्दों के सामने है उसे भी वह जानता है और जो कुछ उनसे ओझल है उसे भी वह जानता है, और उसके ज्ञान में से कोई चीज़ उनके ज्ञान की पकड़ में नहीं आ सकती यह और बात है कि किसी चीज़ का ज्ञान वह ख़ुद ही उनको देना चाहे। उसका राज्य आसमानों और ज़मीन पर छाया हुआ है और उनकी देख-रेख उसके लिए कोई थका देने वाला कार्य नहीं है, बस वही एक महान और सर्वोपरि सत्ता है।’’  (क़ुरआन, 2:255)
  • एक और स्थान पर ईश्वर और उसके गुणों की चर्चा प्रभावशाली ढंग से की गयी है—
    ‘‘वह अल्लाह ही है जिसके अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं, परोक्ष और प्रत्यक्ष का जाननेवाला, अत्यंत कृपाशील और दयावान। वह अल्लाह ही है जिसके अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं। वह सर्वशासक, अत्यंत गुणवान, सलामती देनेवाला, शरणदाता, प्रभुत्वशाली, प्रभावशाली, अत्यंत महान! ईश्वर की महिमा के प्रतिकूल है वह सब शिर्क जो यह लोग कर रहे हैं। वह अल्लाह है—योजनाकार, अस्तित्व प्रदान करनेवाला, रूपकार, उसके सुन्दर नाम हैं। जो कुछ भी आकाशों और धरती में है उसी का गुणगान करती है और वह प्रभुत्वशाली और तत्वदर्शी है।’’  (क़ुरआन, 59:22-24)
    समस्त मानवजाति को संबोधन—
    ‘‘ऐ लोगो! बन्दगी करो अपने रब की जिसने तुम्हें और तुमसे पहले के लोगों को पैदा किया, ताकि तुम बच सको।’’ (क़ुरआन, 2:21)
  • पीड़ित की पुकार वही सुनता है—
    ‘‘वह कौन है जो विकल की दुआ सुनता है जबकि वह उसे पुकारे और वह संकट मोचक है।’’ (क़ुरआन, 27:62)
  • मन की शांति कहां है ?—
    ‘‘जान लो! केवल अल्लाह के स्मरण से ही मन को शांति प्राप्त होती है।’’                    (क़ुरआन, 13:28)
  • ईश्वर की निशानियां उपलब्ध हैं—
    ‘‘वह अल्लाह ही तो है जो हवाओं को भेजता है फिर वे बादल उठाती हैं फिर हम उसे एक निर्जीव भू-भाग की ओर ले चलते हैं और उससे धरती को उसके मुर्दा हो जाने के पश्चात् ज़िन्दा कर देते हैं।’’ (क़ुरआन, 35:9)
    अर्थात् वर्षा से सूखी भूमि में वनस्पति उग आती है और अनेक कीड़े-मकोड़े पैदा हो जाते हैं।
    ‘‘निस्संदेह अल्लाह दाने और गुठली को फाड़ता है जानदार को बेजान से निकालता है।’’ (क़ुरआन, 6:95)
  • ‘‘निश्चय ही रात और दिन के उलट-फेर में और हर उस चीज़ में जो अल्लाह (ईश्वर) ने आकाशों और धरती में पैदा की है, डर रखनेवालों के लिए निशानियां हैं।’’    (क़ुरआन, 10:6)
  • ‘‘तुम ईश्वर को कैसे नहीं मानते जबकि तुम निर्जीव थे उसने तुम्हें जीवन प्रदान किया, फिर वही तुम्हें मृत्यु देगा फिर वही तुम्हें (पुनः) जीवित करेगा फिर उसी की ओर तुम लौटाए जाओगे।’’ (क़ुरआन, 2:28)
    अर्थात् जब तुम ईश्वरीय चमत्कार इतने निकट से देख रहे हो कि स्वयं तुम्हारा अपना जीवन भी उसी की कृपा और सामर्थ्य का जीता जागता प्रमाण है, तो फिर उस ईश्वर से तुम्हारी विमुखता का कारण इसके सिवा और क्या हो सकता है कि तुम्हें न सत्य-असत्य की चिंता है और न किसी के उपकार के प्रति तुम संवेदनशील हो।
  • ‘‘और वही है जिसने तुम्हारे लिए कान और आंखें और दिल बनाए। तुम कृतज्ञता थोड़ी ही दिखाते हो।’’ (क़ुरआन, 23:78)
  • एक प्रश्न जिसमें उसका उत्तर भी मौजूद है—
    ‘‘क्या अनेक रब अच्छे हैं या अकेला अल्लाह जो प्रभुत्वशाली है?’’                            
    (क़ुरआन, 12:39)

वेद की गवाही

वेद अत्यंत प्राचीन ग्रंथ माने जाते हैं, उनमें एकेश्वरवाद की शिक्षा मौजूद है। कुछ महत्वपूर्ण श्लोक प्रस्तुत हैं—

  • एको विश्वस्य भुवनस्य राजा। —ऋग्वेद, 6/36/4

इस संपूर्ण ब्रह्माण्ड का राजा एक ही है।
एक एव नमस्यो विक्ष्वीड्यः।  —अथर्वेद, 2/2/1
एक ईश्वर ही स्तुति एवं नमस्कार करने योग्य है।

  • नत्वावां2 अन्यो दिव्यो न पार्थिवो न जातो वा जानिष्यते। —यजुर्वेद, 27/36
    (हे ईश्वर!) तेरे जैसा अन्य कोई न तो द्युलोक में पाया जाता है और न पृथ्वी के पदार्थों में है। न तेरे जैसा कोई पैदा हुआ और न होगा।
  • मह्द यज्ञं भवनस्यं मध्ये तपसि कलान्तं सलिलस्य पृष्टे।
    तस्मिन् श्रयन्ते ये के च देवा, वृक्षस्य स्कंध परित इव शाखा।
    —अथर्वेद, 10/7/38

सारे विश्व में एक बड़ी पूज्य शक्ति वर्तमान है। जिसका ज्ञान अनन्त है। जो इस संपूर्ण प्रकृति की अधिष्ठाता है। जितनी भी दिव्य शक्तियां हैं वे सभी उस पर आश्रित हैं जैसे वृक्ष के तने के आश्रय से उसकी शाखाएं रहती हैं।

  • ईशावास्यमिदं सर्व यत्किंच जगत्यां जगत्। —यजुर्वेद, 40/1
    इस चराचर जगत में जो कुछ भी गति है, वह सब उस सर्वशक्ति संपन्न परमेश्वर से आच्छादित है।
  • इन्द्रं मिंत्र वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गुरुत्मान्।
    एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः।। —ऋग्वेद, 1/164/46
    विद्वान लोग उसी एक सत्ता को अनेक नामों से पुकारते हैं उसे अग्नि, यम, मातारिश्वा कहते हैं, उस ज्ञान स्वरूप को इन्द्र, मित्र, वरुण कहते हैं और वह दिव्य, सम्यग्ज्ञानवान् उत्कृष्ट पालनशक्तिमान और गौरववान है।’’
  • न द्वितीयो न तृतीयश्चतुर्थो नाप्युच्यते।
    न पंचमो न षष्ठः सप्तमो नाप्युच्यते।।
    नाष्टमो न नवमो दशमो नाप्युच्यते।
    स सर्वस्स्मै विपश्यति यच्च प्राणिति यच्च न।।
    तमिदं निगतं सरः स एष एक-एक वृदेक एवं।
    सर्व अस्मिन् देवा एक वृत्तो भवन्ति। —अथर्वेद, 13/4/16-21

वह ईश्वर न दूसरा है न तीसरा और न चैथा कहा जा सकता है। वह पांचवां, छठा और सातवां भी नहीं कहा जा सकता है। वह आठवां, नवां और दसवां भी नहीं कहा जा सकता है। (अर्थात् ईश्वर एक है, ऐसा नहीं है कि ईश्वरों का छोटा या बड़ा कोई दल हो) वह उन सबको अलग-अलग देखता है जो सांस लेते या नहीं लेते। ये सारे बल उसी के हैं। बल से परिपूर्ण सम्पूर्ण संसार उसी के आश्रित है। वह एक है, अद्वितीय वर्तमान है और निश्चय ही वह एक ही है।

  • तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमाः।
    तदेव शुक्र तद ब्रह्म ता आप स प्रजापतिः। —यजुर्वेद, 31/1
    वह परमात्मा ही अग्नि, आदित्य, वायु, चन्द्रमा, शुक्र, ब्रह्म, आपः और प्रजापति आदि नामों को धरण करता है।
  • य एक इद् हव्यश्चर्षणीता मिन्द्रं त गीभीर्रभ्यनों आभि यः पत्यते वृष्णय वृष्णयावान्त्स त्यः सत्वा पुरुमायाः महस्वान्। —ऋग्वेद, 6/22/1
    जो ईश्वर संपूर्ण मानव संसार का एक ही उपास्य है उसी का इन वाणियों द्वारा भली-भांति अर्चन करो । वही सुख की वर्षा करनेवाला, सर्वशक्तिमान, सत्यस्वरूप, सर्वज्ञ और समस्त शक्तियों का अधिपति है।
  • अत्यमेक इत्थ पुरूरु चष्टे विविश्पति तस्य ब्रन्तान्यनु वश्चरामसि।
    —ऋग्वेद, 8/25/16
    वह एक ही ईश्वर सारी प्रजा का स्वामी है। वह सब का कुशल निरीक्षक है। हम अपने कल्याण के लिए उसकी आज्ञाओं का पालन करते हैं।
  • वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्य वर्णन्तमसः परस्तात्।
    तवेव विदित्वत्ति मृत्युमेतिनान्यः पन्थाविद्यते{यनाय।। —यजुर्वेद, 2/4/18
    मैं उस महान प्रभु को जानता हूं जो अंधकार से परे है और ज्योतिस्वरूप है। उसे जानकर ही मनुष्य मृत्यु को पार करता है और कोई मार्ग मुक्ति का नहीं है।

बाइबल की गवाही

बाइबिल बहुत-सी प्राचीन धर्म-पुस्तकों का संग्रह है। इन पुस्तकों की प्रमाणिकता विभिन्न पहलुओं से संदिग्ध है, फिर भी एक ईश्वर की धारणा की पुष्टि के लिए आज भी इनमें बहुत कुछ सामग्री पाई जाती है।
कुछ उदाहरण प्रस्तुत किये जाते हैं—

  • मैं ही प्रथम हूं और मैं ही अंतिम हूं और मेरे सिवा कोई ईश्वर नहीं।
    (Isaiah, 46:6)
  • तुझको किसी दूसरे पूज्य की उपासना नहीं करनी होगी, इसलिए कि प्रभुवर जिसका नाम स्वाभिमानी है वह स्वाभिमानी ईश्वर है भी। (Exodus, 34:4)
    सुन हे इसराईल की संतान! प्रभुवर हमारा ईश्वर एक ही प्रभुवर है। तू अपने संपूर्ण हृदय और संपूर्ण प्राण और संपूर्ण शक्ति से प्रभुवर अपने ईश्वर से प्रेम कर। और ये बातें जिनका आदेश आज मैं तुझे देता हूं तेरे हृदय पर अंकित रहें। और तू इनको अपनी संतान को हृदयंगम कराना और घर बैठे और राह चलते और लेटे और उठते समय इनकी चर्चा किया करना। (Deuteronomy 6:4-7)
  • मेरे साथ कोई प्रभु नहीं। मैं ही मारता और मैं ही जिलाता हूं। मैं ही आहत करता और मैं ही चंगा करता हूं। और कोई नहीं जो मेरे हाथ से छुड़ाये।
    (Deuteronomy, 32:39)
  • तू महान है और अद्भुत कार्यकर्ता है, तू ही अकेला ईश्वर है!
    (Psalm, 86:10)
  • तू ही अकेला सब राज्यों का ईश्वर है। तूने ही आकाशों और धरती को पैदा किया। (Isaiah, 37:16)
  • ईसा ने उत्तर दिया कि सर्वप्रथम यह है कि इसराईल सुन। प्रभुवर हमारा ईश्वर एक ही प्रभुवर है। और तू प्रभुवर अपने ईश्वर से अपने संपूर्ण हृदय और अपने संपूर्ण प्राणों और अपनी संपूर्ण बुद्धि और अपनी संपूर्ण शक्ति से प्रेम कर (Mark, 12:29)
  • और सदैव का जीवन (Life Eternal) यह है कि वे तुझ अकेले और सच्चे ईश्वर को और ईसा मसीह को जिसे तूने भेजा है जानें। (John, 17:3)
  • ईश्वर एक है और ईश्वर और मानव के बीच में मध्यस्थ भी एक ईसा मसीह है जो मनुष्य है। (Timothy, 2:5)

निष्कर्ष

तर्क, बुद्धि और धर्मिक पुस्तकों की गवाही से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि एक ईश्वर की अवधारणा मानव जीवन की आधारशिला है जिसके अभाव में मनुष्य का जीवन एक कटीपतंग, और पेड़ से टूटे गए  एक टूटे हुए पत्ते के समान है कि हवा के झोंके उसे कहां ले जाकर पटकते हैं। हमें केवल ईश्वर के अस्तित्व को ही स्वीकार नहीं करना है, बल्कि इसके साथ ही उसे अपने जीवन में सम्मिलित भी करना है। वर्तमान समाज की त्रासदी ईश्वर को व्यावहारिक जीवन से अलग कर देती है। इसी कारण समाज अनेकानेक समस्याओं से जूझ रहा है, जिनका कोई समाधान सारे प्रयत्नों के बावजूद संभव नहीं हो पाता। जब हृदय में उसका भय और व्यवहार में ईश्वर की पसन्द-नापसन्द का ख़्याल न हो तो समाज में नैतिकता स्थापित नहीं की जा सकती। जीवन में ईश्वरीय आदेश का पालन हो और उसकी मर्ज़ी को ही हर क्षेत्रा में वरीयता प्राप्त हो, इसके अतिरिक्त मानव-जीवन की प्रतिष्ठा की रक्षा का कोई और उपाय नहीं है और व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन में शांति-स्थापना का कोई अन्य विकल्प नहीं है। ईश्वर के प्रति अगंभीर रहकर, ईश-मनुष्य-संबंध के प्रति संवेदनहीन रहकर, ईश्वर के अधिकारों व आदेशों के प्रति अचेत व निस्पृह रहकर, ईश्वर की सत्ता व प्रभुत्व के प्रति निष्ठारहित होकर हमने, हमारे समाज और हमारी जीवन-व्यवस्था ने, तथा ईश्वर के नियमों व निर्देशों केा अनदेखा करके हमारे सामूहिक तंत्र ने जो अनर्थ किया और एकेश्वरवाद के प्रभावों से जिस प्रकार वंचित रह गया उसकी पूरी स्थिति हमारे सामने है। इस शोचनीय स्थिति का निवारण निःसन्देह ‘एकेश्वरवाद’ में ही निहित है, विशुद्ध एकेश्वरवाद में।

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