‘जिहाद’—हत्या, उपद्रव, आतंक?

‘जिहाद’—हत्या, उपद्रव, आतंक?

‘‘जिहाद हत्या, नरसंहार, रक्तपात, अशान्ति, अन्याय, अपराध तथा आतंक का नाम है। ‘जिहादी’ व्यक्ति एक क्रूर, निर्दयी एवं रक्तपाती व्यक्ति बन जाता है। जिहाद, मानव-अधिकार और विश्व-शान्ति का ‘शत्रु नं॰ एक’ है।’’
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जिहाद उन अनेक विषयों में से एक प्रमुख व प्रज्वलंत विषय है जिन्हें इस्लाम के अपने सूत्रों तथा विश्वसनीय माध्यमों से समझने के बजाय इस्लाम-विरक्त, इस्लाम-विरोधी व इस्लाम-दुश्मन सूत्रों व माध्यमों से समझने का प्रयास किया गया। अतः ऐसी अनुचित व असैद्धांतिक प्रक्रिया के परिणामस्वरूप ‘इस्लाम में जिहाद’ की जो कुछ भी, जैसी कुछ भी, जितनी भी ग़लत, त्रुटिपूर्ण तथा भयावह व घृणाजनक तस्वीरें बनीं, उन्हें विशाल, सशक्त व व्यापक मीडिया-तंत्र द्वारा विश्व के लगभग हर व्यक्ति के समक्ष ‘वास्तविक तस्वीरें’ बनाकर पेश किया जाता रहा है। परिणामस्वरूप अज्ञानता, ग़लतफ़हमियों और घृणा व भय की गन्दी ज़मीन पर उपरोक्त आक्षेपों के कटीले व ज़हरीले झाड़-झंकाड़ हर ओर उगे और ‘लहलहाते’ नज़र आ रहे हैं। किसी भी चीज़, या बात को उसकी वास्तविकता के साथ समझने का उचित माध्यम, मीडिया या राजनीतिज्ञों के बयानात नहीं हुआ करते बल्कि स्वयं उसी चीज़ या वस्तु से, मूलरूप से संबंधित विश्वसनीय (Authentic sources) सूत्र होते हैं।
जिहाद का अर्थ
अरबी शब्द ‘जिहाद’ जिन मूल-अक्षरों ‘ज-ह-द’ से बना है उनसे बनने वाले शब्द (जो क़ुरआन में कुल 17 हैं और 19 अध्यायों (सूरा) में 41 बार प्रयुक्त हुए हैं) घोर परिश्रम, संघर्ष, प्रयत्न, प्रयास के अर्थ रखते हैं। जिस ‘जिहाद’ पर आपत्ति जताई जाती है वह जिहाद (प्रयास, प्रयत्न, संघर्ष) के विभिन्न स्तरों तथा चरणों (Phases) में ऐसा अंतिम व अतिशय चरण और शिखर-बिन्दु है जहां ‘‘सशस्त्र संघर्ष’’ अनिवार्य (Inevitable) हो जाता है। ऐसे ‘जिहाद’ (क़िताल अर्थात् ‘युद्ध’) पर क़ुरआन के मुस्लिम विद्वान भाष्यकारों (मुफ़स्सिरीन) ने बहुत विस्तार से लिखा है तथा इस विषय पर विभिन्न भारतीय व विदेशीय भाषाओं में पर्याप्त साहित्य भी उपलब्ध है। उपरोक्त शंकाओं, भ्रांतियों तथा आक्षेपों के तथ्यपरक तथा वास्तविक उत्तर व निवारण के लिए इस साहित्य का अध्ययन—सत्यनिष्ठ अध्ययन—करना चाहिए। यहां संक्षेप में और कम से कम शब्दों में यदि जिहाद की वास्तविकता बयान की जाए तो वह कुछ यूं होगी:
जिहाद की संक्षिप्ततम व्याख्या
अन्याय, अत्याचार व शोषण करने वाली शक्तियां, रक्तपात, नरसंहार करने व तबाही, बरबादी फैलाने वाली शक्तियां, कमज़ोरों पर जु़ल्म ढाने वाली, उन्हें उनकी बस्तियों, आबादियों, घरों से निकाल देने या निकलने पर विवश कर देने वाली शक्तियां, ये सारे कुकृत्य ‘सशस्त्र’ होकर करें तो मुस्लिम समुदाय और मुस्लिम शासन का कर्तव्य है कि सशस्त्र होकर जु़ल्म का मुक़ाबिला किया जाए, अपनी रक्षा (Defense) की जाए, ज़ालिम की अत्याचार-शक्ति-सामर्थ्य को कमज़ोर करके, तोड़कर अत्याचार व शोषण का उन्मूलन किया जाए। सत्य व ईशपरायणता तथा न्याय व शान्ति के दुश्मनों को पस्त किया जाए। न्याय व शान्ति की स्थापना की जाए। उस सत्य मार्ग, अर्थात् शाश्वत ईश्वरीय मार्ग को प्रशस्त किया जाए जिस पर चलकर मानव-समाज और मानवजाति इहलौकिक व पारलौकिक सुख-समृद्धि-सफलता से आलंगित होना सहज, सरल व संभव पा सके। इस सशस्त्र संघर्ष में स्वयं अत्याचार व अन्याय करने से पूरी तरह रुका जाए। ईश्वरीय आदेशों, नियमों, शिक्षाओं और सीमाओं का पालन किया जाए...।
यह इस्लामी जिहाद की संक्षिप्ततम व्याख्या है। ऐसा ‘जिहाद’ किन्हीं भी (अलग-अलग) नामों से मानवजाति के दीर्घ इतिहास में हमेशा से होता आया है। सारे इन्सानों ने सशस्त्र जु़ल्म व अत्याचार के सामने घुटने टेक दिए हों, ऐसा मानव इतिहास में कभी नहीं हुआ है, क्योंकि ऐसा होना उस मूल प्रकृति के प्रतिकूल है जिस पर मनुष्य की संरचना हुई है। अलबत्ता इस्लाम ने इतिहास में पहली बार यह श्रेय प्राप्त किया है कि उसने जिहाद के नियम और आदेश नैतिक व वैधानिक (क़ानूनी), दोनों स्तरों पर पूरी तरह से निश्चित (Codified) कर दिए हैं, और इस बात को यक़ीनी व अवश्यंभावी बनाया है कि ज़ल्म के प्रतिरोध में ख़ुद जु़ल्म हरगिज़ न होने पाए। प्रतिशोध-भावना ऐसी प्रबल हरगिज़ न होने पाए कि न्याय, दयाशीलता और इन्सानियत का दामन हाथ से छूट जाए (क़ुरआन, 5:8)।
जिहाद—आतंक?
जहां तक जिहाद के आतंकवाद होने का प्रश्न है, इस्लाम के पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) तथा उनके अनुयायी, सत्य-धर्म के आह्नान के साथ ही मक्कावासी विधर्मियों के क्रू$र आतंकवाद से, 13 वर्ष तक जूझते; तथा स्वामी लक्ष्मीशंकराचार्य के अनुसार (पुस्तक ‘इस्लाम आतंक या आदर्श’-2008), 23 वर्षों तक आतंकवाद के विरुद्ध लड़ते रहे। (यहां तक कि नगर ‘मक्का’ और निकटवर्ती क्षेत्रों से जु़ल्म व आतंक का सफ़ाया हो गया)।
इस्लाम में ‘जिहाद’ दरअस्ल आतंक को ख़त्म करने, आतंकवाद को पस्त व परास्त करने का एक ‘ईश्वरीय-मार्गदर्शित’ प्रक्रम है। इस प्रक्रम में अत्याचारी शक्तियां यदि आतंकित होती हैं अतः जिहाद को आतंकवाद की संज्ञा देती हैं तो यह बात समझ में आती है। वरना स्वयं जिहाद का आतंकवाद कहा जाना घोर मिथक है। किसी पाश्चात्य विद्वान-विचारक के ये शब्द, वस्तुस्थिति को उसके वस्तुनिष्ठ रूप में पेश करते हैं:

Terrorism of the powerful is called war, and
war of the weak is called terrorism.”
(शक्तिशाली का आतंकवाद युद्ध कहलाता है और निर्बल का युद्ध, आतंकवाद)

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